क्या आपको कभी शर्म आती है
तो फिर आप नंगे क्यूँ नहीं हो जाते
क्या बखेड़े से जी घबराता है
आप नामर्द क्यूँ नहीं हो जाते
क्या आप अक्षरों को पहचानते
चारों ओर बिखरा हुआ दर्द क्यूँ नहीं लिख पाते
क्या आप सिगरेट पीते हैं
सरकारी लाशों से उठता हुआ धुंआ
क्यूँ नहीं गटक जाते
क्या आप चल पाते हैं
आपके ख़याल, बेखयाली तक क्यूँ नहीं पहुँच पाते
क्या आप लड़ाते हैं
खुद को खुद से लड़ना क्यूँ नहीं सिखाते
क्या आप पीते हैं
गरीबों को अपमान पीना क्यूँ नहीं सिखाते
क्या आप गन्दगी फैलाते हैं
बेचारी आवाम को इंक़लाब क्यूँ नहीं बताते।
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