Sunday, 2 December 2012

अनुरोध..........

महाराज!
धन्य हैं आप 
नतमस्तक हूँ आपके आशीर्वाद पर 
मुझे भी मुफ्त में सलाह नहीं बाँटनी चाहिए 
आपके चरण-कमल कहाँ हैं 
मैं भी अर्पित करना चाहता हूँ 
कुछ हारी हुई कविताएँ 

प्रभु!
आदर स्वीकार करें 
भाषा और संस्कृति प्रेम बचाए रखने में 
समस्त क्रियाओं का भ्रूण-परिचय करने में 
अनगिनत प्रतिभाओं के गर्भ-पतन करवाने हेतु 
आपने अदम्य साहस का परिचय दिया है

देव!
एक और आग्रह सुन लें 
सुसंस्कृत से प्रतीत होते जिस बालक पर आप आसक्त हैं 
अपनी मुट्ठी में उसने नमक बाँध रखा है 

हे घोघरदेव!
शीघ्र ही आपको प्रगति की दीवार छोडनी पड़ेगी 
और बाल-सुलभ कौतूहलों से जूझना पड़ेगा  

Friday, 7 September 2012

बोरिंग-कहानी-1



क्या मालूम हो गया तुम्हें
मैंने फिर से, अपना मोबाइल खो दिया है
कोइ नई बात नहीं है ना 
मैंने फिर से, एक नया सिम लिया है 
अब नया हेंडसेट खरीदने के लिए 
जेब में पैसे नहीं हैं 
दो मिनट के लिए कोइ उधार भी नहीं देता 
मेरे दोस्त, तुम्हारे जैसे नहीं हैं 
खैर, साइबर कैफे जाकर 
facebook से तुम्हारा नंबर लिया 
पुरानी ATM स्लिप के पीछे लिखकर 
वापस wallet में संभाल दिया 
पूरे रास्ते मैं ढूंढता रहा 
बड़ी मुश्किल से वो पुराना बोर्ड दिखा 
इन्टरनेट, फैक्स, फोटो-स्टेट के नीचे 
एक कोने में था PCO लिखा 
पहले से ही निकाल कर वो पर्ची 
जल्दी से उस दुकान में घुसा 
टेलीफोन की बाबत पूछने पर 
system पर गेम खेलता अधेड़ बड़ी जोर हंसा
मोबाइल के ज़माने में ढूँढ़ते हैं पब्लिक बूथ 
देश-दुनिया तो गर्त में ही जाएगी 
अब भी कितना पीछे है हमारा यूथ 
हंसी के रुकने या शायद गेम-ओवर होने से  
उनको मेरी बेचैनी का एहसास हुआ 
अरे! कोई बहुत ज़रूरी बात है तो 
मेरे फोन से ही ट्राई करो ना, बुआ!!
कुछ और सोचे बिना ही मैंने 
उनके हाथ को लपक लिया 
चश्मे के नीचे कुछ रुका हुआ था 
चुपके स्क्रीन पर टपक लिया 
पोंछ कर सीने से, पर्ची खोलकर  
मैं तुम्हारा नंबर डायल करने लगा
इससे पहले की कॉल कनेक्ट होती 
कोई इनकमिंग का सिग्नल लगने लगा 
'हमरा हऊ चाही' की tune में 
हमारी लोकल संस्कृति बजने लगी 
हथेली खोल दी मैंने 
'मुन्नी' उँगलियों ही लिपटने लगी 
अंकलजी टोन सुनते ही 
काउंटर छोड़ कर झपटे 
तुम अपना जरूरी कॉल बाद में कर लेना 
पहले हम अपनी 'शीला' से निपटें 
ऑन करते ही उनकी आवाज
गरम शीशे सी पिघल गयी 
मैंने अभी तक मेहंदी नहीं लगाई 
सावन की आखिरी तारीख भी निकल गयी 
इतने में वो दबंग अपनी privacy बचाते हुए 
बाहर गली में निकल लिए 
फोन फंसा लिया कंधे और गर्दन के बीच 
पड़ोस की दीवार पर शंका निवृत हो लिए 
वापस लौट कर आते ही 
वोही आवाज़, वही दम था 
जल्दी अपनी बात ख़तम करो 
हमारे पास वक़्त ज़रा कम था 
इस बीच मैंने वो नंबर इतनी बार पढ़ा 
की शुरू से आखिर सब याद हो गया 
कई बेल्स के बाद भी रिस्पोंस नहीं आया 
सारा talk-time भी बर्बाद हो गया 
अब, ध्यान गया 
तुम तो अपने क्लास में होगी 
मैं तो यूँही आम बातें करता रहा हूँ 
तुम्हारी दिलचस्पी तो किसी ख़ास में होगी 
चलो इतना वक़्त बर्बाद कर ही दिया 
तो ये भी बता दूँ 
मैं कोई गली, रास्ते, मकान भूलता ही नहीं हूँ 
अब तुम ही कहो मैं अपना कौन-सा पता दूँ।।।।।
      

Thursday, 21 June 2012

उबलना क्यूँ जरूरी होता है??


उबलना क्यूँ जरूरी होता है
आराम से सोचते हुए लिखना
ख्वाब, ख्वाब ही रहते हैं कई

कविता सिर्फ पढने के लिए होती है क्या
कुछ सुनाने के के लिए क्या लिखना चाहिए

अक्षर सिर्फ शब्द बनकर रह जाते हैं
उम्मीद के रास्ते घेरकर
परछाइयां हमेशा छुपकर नहीं बैठती

वनस्पति ज्ञान पढ़कर
फलों की विविधताओं को बेचना
इतना मुश्किल होता है
और मैंने सुना था
कुंदन जल कर लाल होता है!!

किसके 'यलगार' बोलने से
जंग शुरू हो जाएगी
ढूंढते हुए उस 'सेनापति' को
कैसे परखेंगे छद्मवेशियों को
क्या सिपाही फिर से उतने ही मारे जाएंगे??

बदलाव की सोचते ही
जिम्मेदारियों, चुनौतियों से घबराहट होती है
यायावरी, पीठ मोड़ते हुए
किसी और ही शक्ल में आती है..

छुपने की कोशिश शायद जीतने की हो
वक़्त बीतेगा तो हिम्मतें परखीं ही जाएंगी...
 

विकास....

कोयल की चाची ने उससे कहा था 
वो किसी कोव्वे की बेटी थी 
पूरी जिंदगी ना नहाने की कसम खा ली 
सुरीला गाती रही.....
लेकिन रंगत उसकी काली की काली रही 

सिर्फ एक ही मौसम में गाने की आज़ादी 
उसने अपने अंडे भी 
कौव्वों के घोंसलों में रखने शुरू कर दिए 

साल गुजरते रहे 
नए परिंदे उड़ना-गाना सीखते रहे 
और 
अपने पूर्वजों के बताए रास्ते पर चलते रहे 

कौव्वों को 
चालबाजियों का पता चला 
जम कर क़त्ल-ए-आम हुए..

थोड़े-थोड़े ही बचे 
कोयल और कौव्वों में अब भी बहस जारी है..
क्या जरूरी नहीं 
प्रगति को रोक कर 
कुछ पुरानी नीवों की मरम्मत की जाए??

Saturday, 16 June 2012

अर्ध विक्षिप्त सत्य..........

रेंगती हकीकत ...
बूँद बूँद रिसती टीस ...सवाल ख़याल ...
टीसते फांसे
अर्ध विक्षिप्त सत्य..........


शरीर की सारी त्वचा 
एक पारदर्शी-सा खोल मात्र रह गयी है … !

व्यक्तित्व को स-प्रयास ठूंस दिया गया है 
चरित्र को द्रव बना लेने से और भी आसानी रही .. !

निडरता मृत्यु के चिंतन से मिली नहीं .. 
सत्य और असमर्थता की विभीषिका ने 
डर को ही डरा कर निडर कर दिया है !

शल्क की यथार्थपरकता का उद्देश्य 
टूट जाने के बाद भी टुकड़ों को समेटे रखना है ! 
कवि-लेखक भी अपनी सबसे प्रबल उद्वेलना, 
पीठ के पीछे दिनचर्या का सारा गणित लिखते हैं !

विचारों तक क्रांतिकारी ग्राह्य हैं .. 
वास्तविकता शब्दों और छंदों से परे है ..
रचनात्मकता भी अर्थ और उपलब्धता के सामर्थ्य पर निर्भर !

जो भाषा हममें से किसी की भी मातृभाषा नहीं है 
समेकिकता के नाम पर राष्ट्रभाषा बना सकते हैं 
बलात कोई भाषा, जन-भाषा तो नहीं बनाई जा सकती … !

लेखकों-समीक्षकों को प्रभावित करने की सीमाएं पारकर 
पाठकों के लिए लिखे जाने पर अश्लीलता का आरोप-मंडन .. !

सारे ज्ञानी मित्र सलीलता की पांडवों के तरह रक्षा करते हैं 
और खपने देते हैं समाज को द्रौपदी की मर्यादा सदृश 
सत्ता-समर्थ दुश्शासन का अट्टहास 
किसी भीम को प्रण नहीं देता 
बाकी चारों भी हाथ जोड़े 
नैतिकता के हरि-नाम की शरण में पूर्ववत रहते हैं...

कई दिनों से......

कई दिनों से आईना मुझे पहचानता नहीं 
कई दिनों से कोई दोस्त मुझसे मिला नहीं 
कई दिनों से फ़क़त उम्मीदों के कांटे सूखते रहे 
कई दिनों से फूल हिम्मत का शाखों पर खिला नहीं 

कई दिनों से हरुफें रूठीं रहीं हैं अशआरों से
कई दिनों से एक उम्दा शे'र भी सुना नहीं
कई दिनों से तसव्वुर, माज़ी संदूक-ताले में बंद है
कई दिनों से इल्म-ए-शायरी, करामात किया नहीं

कई दिनों से डायरी में कुछ लिखा नहीं
कई दिनों से चाँद भी खिड़की में दिखा नहीं
कई दिनों से रात ने कपड़े नहीं बदले
कई दिनों से दिन भी दफ्तर में टिका नहीं

कई दिनों से हवाएं लिपटती नहीं सज़र से
कई दिनों से क़तरा-ए-अश्क पत्ता धुला नहीं
कई दिनों से आवारा नज़रों में खूबसूरती कैद रही
कई दिनों से वाइज़ की नाउम्मीदी का गिला नहीं...................

तुम्हारी खामोशी.........


तुम्हारी खामोशी दिल में बैठ जाती है
रोज सुनता हूँ लेकिन
चिड़ियों का चहचहाना याद नहीं रहता

वक़्त अपने पहियों के निशान
सूखी सड़क पर छोड़ता है
अगरचे इधर निकलने से पहले
किसी गीली गली से गुजरा हो

यादें धुल कर निकल जानेवाली मैल नहीं
बारहा सफाई की ज़द्दोज़हद
कहीं से आकर फिर जम जाती है
कुफ़्र कोई दिल-ओ-दिमाग पर

उम्मीदें आदतन परछाइयों-सी बन
दो पहर बाद लम्बी होकर
तेज़ कदमों से भी आगे ही चलती

अन्धेरा आवाजें देकर थक जाता
सारी अमावस अकेले चलने की कसम खा ले
अपना भी अक्स देखने के लिए
रौशनी की दरकार बनी रहेगी....

खूबसूरती।..

इक तस्वीर खुली सामने
मुसव्विर खद खुदा रहा होगा 
झूमती लटों के सहारे, आज 
यहीं, ज़न्नत ज़मीं पर उतर रही

संभलते हैं ज़ज्बात 
अनछुए नाज़ुक हाथों को थाम 
ख्वाहिशों का क्या है, फासला 
दूर, दरया-ए-अश्क़ पर सिफ़र रही 

बहुत हल्की-सी मुस्कुराहट
जैसे कोई कमसिन शरारत
तारीफ़ भूल गयी सब, इशारे
सूफी, खूबसूरती चेहरे पर बेउमर रही

गुम गईं हसरतें हासिल की
सर्द हवा से बयाँ कोई हुस्न
फलक भी छोटा रहा, चितवन
आड़े, बेजा हालात लम्हों पर खुशतर रही..........




ताज़ा ग़ज़ल...

तुम्हारी तारीफ़ में कोइ ताज़ा ग़ज़ल हो
वक़्त बह जाए हर लम्हें, जमता-सा पल हो
तुम्हारी तारीफ़ में कोइ ताज़ा ग़ज़ल हो

नापसंदगी महफूज़ रखे, जुनूं-ए-इश्क 
बासी पड़े रहे आज के शिकवे
तुम रोज़ सिरहाने मुस्कुराता-सा कल हो
तुम्हारी तारीफ़ में कोइ ताज़ा ग़ज़ल हो

लटें उलझती गईं, संवरने भर की कोशिश
धरे पड़े हैं वाईज के सब नुस्खे-खूब-सीरती
तमाम मुश्किलात तुम अकेला-सा हल हो
तुम्हारी तारीफ़ में कोइ ताज़ा ग़ज़ल हो

वाकई अजीब है, खला की खुदपरस्ती
महंगी वफ़ा-ए-इश्क,मौत-ए-मुहब्बत है सस्ती
जिंदगी की असलियत तुम खुदाई का कँवल हो
तुम्हारी तारीफ़ में कोइ ताज़ा ग़ज़ल हो

तमाम खिड़कियाँ-दरवाजे, ज़ज्बों के
लरज़ कर टूट जाते ज़ब्त के कमज़ोर ताले
सिफारिश-ए-मौत तुम जिलाता-सा क़तल हो
तुम्हारी तारीफ़ में कोइ ताज़ा ग़ज़ल हो.................

देखो..

हम आज भी उसी मोड़ पर बैठे हैं
इक बार ज़रा मुड़कर देखो..

तेरे पहलु में समा जाने के 
आसार अभी तक जिंदा हैं
दो-चार कदम चलकर देखो..

तेरी आँखों से बहता पानी
उसी दरया में डूबें, मर जाएँ
अपनेआप से हम कितने शर्मिंदा हैं
तुम आज ज़रा छूकर देखो..

तेरी तस्वीर..
नहीं, कोई तकलीफ नहीं.....
मेरी बिस्तर के निचे दबाकर
यादों का पुलिंदा रखा है..
इक रात ज़रा झुककर देखो...

ये बेमतलबी तरन्नुम,
ये उलटी-पुल्टी बातें
वाइज़ को जाया लगती होंगीं.
ये ज़ज्बात कितने चुनिन्दा हैं
इक बार महसूस कर देखो.......

ख़ुमारी

ख़ुमारी नींद भर 
खला के दामन में 
शर्मा के रात कोई, 
जूनून-ए-जानशीं 
शर्मिंदा करवट पले 

सहम जाए ख़ामोशी 
तेज़ साँसों तले 
उनींदी उमर लिए, 
इल्म-ए-खूबसूरती,
आवारा निगाहें बहें

लम्हों की गर्दन
गेसू लिपटती हुई यादें
पलकों पर आब-ए-हयात,
तिश्नगी का वजूद मिटाने
कमसिन रास्ते हरक़त करें

सुबह बड़ी शदीद
बेतरतीब बरसी वफायें
शब्-ए-फुरक़त तनहा शबनम
थकती बूंदो को भी
टपकने की फ़ुर्सत मिले

खूबसूरत माजी,
कुछ बेशकीमती नज्में
इश्क-ए-आवारा,
कोई ख़ाक-सी बरक़त मिले.........

गनीमत है..

चलो आप कहते हैं तो नहीं सोचता 
उन सालों के बारे में 
जो लौटकर वापस नहीं आयेंगे..

मैं नहीं सोचूंगा उन ख्वाबों के बारे में 
जिन्हें देखने के लिए 
मैंने एक अदद आँख उधार ली थी 
अपनी दूसरी आँख के साथ मिलाकर 
जोड़ा बनाया था ना..
 
नहीं सोचूंगा उन रातों के बारे में 
जिनके धागों में मैंने यही ख्वाब पिरोये थे 
मैं चाहता ही नहीं हूँ आजादी
बड़ी मुश्किल से
अपने आवारा हाथों को बाँधने के लिए
वक़्त की रस्सियों पर मैंने इतने बल दिए थे
इतने बल की मेरी खुद्दारी भी ऐंठ जाये
रगों में उठे और गले में बैठ जाए..


मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है
ना तो इश्क के ज़ज्बे से
नाही रूमानियत से
मुश्किल बस एक ही है
ज़रा वक़्त देख कर इस सरूर को सर चढ़ना था
मैंने इलाज-ए-मजलूम आशिकी पा ली है
ज़रा अपने ज़ज्बातों की हैसियत
और अपने चेहरे की कैफियत सोचकर रुकना था

लगाम देना चाहिए था सरफरोशी को
लीक से कुछ अलग हट कर करने के जूनून को
सब कुछ ख़तम हो गया इस भरम की जरूरत
हर रोज़ नए अफ़साने लिखनेवालों को होगी 


मैंने तो शुरू भी इसी से किया है
और ख़तम भी यहीं करूँगा.
नहीं, आप फिर गलत समझे
ये क़दावत नहीं नाही शिकायत है
मेरे ज़हन के कुरआन छपी हुई
एक ही चुनिन्दा आयत है..
या तो मैं अहल-ए-खुदा की असलियत
सवाल रख दूँ फरिश्तों से,जो सुनें
या फिर आप जैसे पढने-सुनने वालों की गनीमत है..

तुम्हारे नाम........

आज की शाम फिर से तुम्हारे नाम लिख दूँ 
याद आया फिरसे कोई जरूरी काम लिख दूँ 

ख़ास हो सके ज़ज्बा 
कैद करूँ लफ़्ज़ों को आम लिख दूँ 
हसीं पलकों उम्मिद्जुदा 
जिल्द-ख़्वाबों के दाम लिख दूँ 

कुछ धोखा ही सही खला के होठों
तसव्वुर का खाली जाम रख दूँ 
इक पल को भी जो लौटे काफ़िर हवा 
गिरवी मैं सारे मौसमों के घर बाम रख दूँ..................

वो जो.....

वो जो चली गई, वो खिज़ा थी 
टूटे पत्तों ने मुफलिस शाखों को समझाना है 

वो जो रूठ गई, वो हवा थी 
मौसमों को कब तबीयत पूछकर आना-जाना है 

वो जो बह गई, वो घटा थी 
लहरों ने चंद रोज़ ही साहिल का कहा माना है 

वो जो बुझ गई, वो शम्मा थी 
परवाने के परों लगकर नाहक़ रात को जलाना है

वो जो मुड़ गई, वो अदा थी
हुस्न ने आवारगी से कब तक साथ निभाना है

वो जो गुजर गई, वो लम्हा थी
उमर की जूस्तजू सर लिए क्या कोई एक ही दीवाना है

वो जो बिखर गई, वो शीशा थी
वजूद को टुकड़ों में बांटकर मुझेभी नाम कमाना है

वो जो उमर गई, वो निदा थी
अजां में फिर भी खुदा का नाम शायरी राग पुराना है

वो जो सिमट गई, वो खुदा थी
उज्र काफ़िर क्यूँ ना रखे बुतपरस्ती का ज़माना है.......

मेल-जोल..

जब हम अजनबियों से मिलते हैं
अजीब लापरवाह-ए-अंजाम सफ़र पर चल पड़ते हैं 
उमर के किसी भी मोड़ पर खड़े हों हम 
दिमाग बच्चा हो जाता है 
दिल के खिलौने को खेलते-खेलते 
फिर से तोड़ देने को बेताब हुई जातीं 
हथेलियाँ, खुशनुमा बेमतलब इत्तेफाक बर्गलाते हैं 
अख्लाक़- हमारे सितारे आपस में कितने मिलते हैं 
देखो ना- हमदोनों साथ कितना खिलते हैं 
जबरन पैदा करते हैं माज़ी आँखों में 
आंसू, हसीं रुखसारों पर बिलकुल भी नहीं जमते हैं
आओ चलो तुम्हें भी दिला लाऊं
तुम बस अपनी पसंद बताओ
हमने देखे हैं बाज़ार जहां ख्वाब भी बिकते हैं

जब हम फिर से तनहा रास्तों लौटते हैं
उम्मीदों की लाश अपने ही काँधे और श्मशान ढूंढते हैं
सारे सफ़र में जलती हुई रूहें मिलीं
आगोश में खला की आग के तमाम
हमकदम, हमसाया होने की जिद में अड़े जलते हैं
याद तलवों के ज़ख्मों पर तरसतीं
हौसलों के अश्क़ कातिल लबों बरसतीं
साँसे, लम्हें अब भी कतल होने का दम भरते हैं
अभी लंबा है सफ़र कोई अजनबी
लीकों पर अपने हक़ से करते दिल्लगी
राहगुजर, मंजिलों के मिल जाने से ही डरते हैं.....




सीखाए देता हूँ..

जागती आँखों से कोई सपना देख लेता हूँ 
शर्मिंदगी जल रही है लफ़्ज़ों, मैं आँखें सेंक लेता हूँ 
क्या करूँ गर इल्म-ए-शायरी भी रूठ रही है 
जाते-जाते और अशआरों के रेज़े फेंक देता हूँ

मुहब्बत को शिक़ायत सुनते हो तुम 
मैं नफ़रत को भी दुआएं देता हूँ 
जहाँ के दर्दों का इलज़ाम तुम सिफर कर दो 
मैं तमाम इलज़ाम-ए-इश्क-ओ-कसूर लेता हूँ....

तुम मेरे उम्मिदों की वहशी रगें काटो
अपने ही खून से शायद मेरी प्यास बुझे
तुम दलीलें देना सजा-ए-कतल जरूरी
मैं फिलवक्त आवारगी को भिगाए देता हूँ......

जब करो ज़ज्बातों को जिबह
हालातों को संगीन इरादों का अंदाज़ा ना हो
मक़तूल मर्ज़ी से सूली चढ़ा तो, जिन्दा रहेगा
ताउम्र तुम्हारे ज़हन की आँचल किनारे गाँठ बन
चलते-चलते मैं मौत को भी इब्तदाएं सीखाए देता हूँ..

फिकरा....

जब आये बाग़-ए-बहार 
कुछ दो पल तो ठहरा करे 
पलकें झंपकी, फितूर-ए-इश्क गायब 
तुक-ए-लज़ीज़ यूँ ना बिखरा करे

तसव्वुर मिले कुछेक लम्हों से 
शदीद मोहलत कोई तो निदा मिले 
आशिक-ए-आवारा फिर से 
हिम्मत-ए-इश्क़ का मिसरा करे 

अश्कें धो रहीं हैं,
इलज़ाम-ए-वफ़ा धोती ही रहेंगी
अलम-ए-रुख्सतगी-ए-बहार
इक अदद गम कब तक जिकरा करे

आज की शाम की बयार
अपने यारों के साथ का ख़ुमार
वाइज़ अपनी खैर-खबर ढूंढें
आनेवाली ज़र्द रात का फिकरा करे .........

जवानी.........

कई टुकड़े नज़्म, एक अधूरी कहानी 
बैठी उमर के रास्तों 
बिला वजह नाराज़ है जवानी 

बजाय उम्मीद-ए-सफ़र चलने 
जिबह-ए-इश्क़ तैयार है मरने 
देखने किसकी आँखों ज्यादा है पानी 

दीदार-ए-निगारिश-ए-महबूब 
दुश्वार यूँ दिन-रात का मिलना 
अकलियत के तमाम इशारे है बेमानी

तरन्नुम भी बेवक्त रूठी रहे
बयां करने को जुबां-लफ्ज़ ना रहे
ज़ख्म-ए-निदा जिंदगी हज़ार मिले
दर्द-ए-दिल--ओ-इश्क कोई है सानी

वाइज़ लाख उज्र करे
यूँही बेमतलब के ज़ज्बात लिखे
शायर-ए-आवारा ख़ाक-ज़र्रा
इक तूही नहीं फ़िज़ा भी है दीवानी

मलामत हर क़तरा-ए-दर्द करेंगे
तुक-बेतुक दिन-रात लिखेंगे
अभी-अभी क़ज़ा-ए-कब्र कलम ने
हुनर को फना करने की है ठानी.......

मिले..

कोई सूरत, कोई सीरत, 
कोई ज़िस्म, कोई ज़ीनत
कहीं खमीरी से मुंह मोड़ती है?- मुहब्बत 
हर ज़र्रा इक-दूसरी मायूस शक्लें 
कोई बेलौस निदा तो मिले 
काफिरी छोड़ मुसलमाँ हो जाएँ 
बजाये खानाबदोशी, 
उम्मीद-ए-सहर की गज़लें गायें 
ज़बां-ओ-ज़ेहन में फर्क न हो जिसके 
कोई दीगर खुदा तो मिले 
नक्कारों की दुनिया में बेकारे शहजादे
यूँही मिसरों से बांटते रहे
मदहोशी-आवारगी का मुदावा आते-जाते
अशआरों ठहाके लगानेवाली,
कोई हसीं लफ्ज़-ए-इदा तो मिले
आप नज़र करें, आपकी ख़िदमत है
यूँ तो वफ़ा-ज़फ़ा सब तिलस्मी खिलअत है
कुछ देर पहनकर उतार देती है रूह
जां-ए-रूह, बेवफा ही सही महबूब
कोई हमशौक-ए-इब्तिदा तो मिले..............


ज़ीनत= Beauty ; खमीरी= materialism ; निदा= call ; लफ्ज़-ए-इदा= words of happiness ; खिलअत = clothes ; हमशौक-ए-इब्तिदा= same hobby of inventing /exploring

जिंदगी

महबूब-ए-तीरगी, चाँद सनम 
क्या ये मेरी ही परछाई है
तारीफ़ सितारों ने किसी चेहरे की हो 
खुदपरस्त चांदनी बिला बात मुस्कुराई है..
अभी ज़रा गहरा हुआ है शब्-ए-ग़म
अभी लफ़्ज़ों ने ली अंगड़ाई है
चलो उनका हाल भी पूँछें शबनम
जिनके चेहरे की रानाई है 
ज़न्नत नशीं आँखों, ज़ज्बों जो बहा दी
वो मोती, मेरे क़त्ल-ए-दिल की भरपाई है 
तुम भी कभी साथ बैठो देर-रात ख़्वाबों
मैं सुनाऊं क्यूँ राह-ए-इश्क बारहा रुसवाई है
गौर कर लूँ मैं ग़लतफ़हमी इक ख़याल गर
हवा के परों पर बिछकर जिंदगी चली आई है...

दिल..

मुआफ कर अब हमें भी मासूमियत की अदा से 
गम-ए-ज़ज्बा-ए-पाक से, परवाज़ कर हमें ऐ फितना दिल

मुसाफिर था वो जो चला गया अपने वतन को 
शब्-ए-इंतज़ार खाली रास्तों पर,रोएगा अब कितना दिल

चलो कोई नई शब्-ए-गम ढूंढ लें, खुद्दारी ही दफ्न करें 
उमरें लगीं खाली रातों, बातिन आवाजों को क्या करना दिल 

हसरतों को अबके शगुफ्तगी ओ खुदपरस्ती देना 
हुस्न-ओ-बीनाई फिरसे ख़ाक़-कुर्बत में ना मर मिटना दिल

मुमकिन है नसीम कभी माजी पन्ने उलट दे
वुसअत-ए-अश्क संभालकर, आरिजों पर लिखना दिल

शौक-ए-शीशागरी को सिर्फ खुद की दुआ लगे है
वाइज़ के हाथों तमाम संगरेज़ों से, इल्जामों से ना डरना दिल

जलाते रहना तखइल चिरागों, किसी वहम-ओ-गुमाँ से
शनासाई मरगूब नज्मों से, कोई गोशा छुपाए रखना दिल..............



परवाज़- happy, बातिन-inner self, शगुफ्तगी-corrective, हुस्न-ओ-बीनाई- Alluring Beauty, वुसअत-ए-अश्क- expedition of tears, आरिजों- cheeks, शौक-ए-शीशागरी- hobby of making glasses, संगरेज़ों- small stones, तखइल- thought, वहम-ओ-गुमाँ - illusions, शनासाई- realationship,मरगूब- pleasing, गोशा- corner

Friday, 15 June 2012

सर का दर्द.....

छोटे-बड़े शहरों में रहने वाले कई सारे परिवारों में से किसी एक परिवार के बीच मैं भी पला बढ़ा हूँ। हर छोटे बड़े   संसद में एक सदस्य है जिसकी स्थिति बहुत मार्मिक है- गृहिणी.. प्रगतिशील विचारधाराओं वाली स्वायत्त स्त्री नहीं दिखती है उनमें. दिखती हैं तो ममता के अतिरेक, त्याग और संयम की मूर्तियां .. इस  ढाँचे से बाहर रह कर वो हमारी सामाजिक  जिम्मेदारियों का सापेक्ष  निर्वाह तो वह कर सकती है लेकिन  सर्वथा किसी न  किसी पीड़ा को सहने की आदत, निष्प्रयोज्य ही दुर्लभ रचनात्मकता वाले चरित्र को भी दयनीय कर देता है.. किसी भले मानस के विचारों को शब्दों में गढ़ने की कोशिश।........................

शहरों में नींद तो पूरी आती नहीं 
सपने भी अक्सर आधे 
डॉक्टर तुम्हें नींद की दवाएं दे सकता है 
लेकिन सपने ना आयें ऐसी कोई दवाई नहीं बनी 
तुम्हारी बार-बार सर दर्द की शिक़ायत
किसने कहा तुमसे इन टुकड़ों को सहेजने 
एक ही करवट से रोज सुबह उठोगी
बेचारी एक कनपटी कब तक चुभन सहेगी 
क्रोशिये की सूई से इतनी मशक्क़त 
लोग हाथ के काम, कम करने के फेर में हैं 
तुम हो की सारी समेटी हुई चीज़ें 
पुरानी तस्वीरें और साड़ियाँ फैलाए
बीते दिनों की धूल झाड़ कर सफाई करोगी 
वैक्यूम क्लीनर से ज्यादा तेज़ तुम्हारी नाक खींचेगी  
साईनस का दर्द मुझे कभी हुआ ही नहीं 
सारी डाक्टरी अपने आप करना 
फिर से दो-तीन नींद की गोलियां ले लेना 
और फिर से वोही आधे सर का दर्द किये जागना..


कल की बातों में आज भूल रही हो 
कहीं ऐसा ना हो की कल के लिए 
कोई दर्द, कोई टीस ही न बचे................ 
 

Friday, 1 June 2012

दो अधूरे सच ....

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हमने शुरुआत में ही सब तय कर लिया था ना राजेश??

हमदोनों कभी एक-दूसरे की आज़ादी में दखल नहीं डालेंगे.
हमदोनों अपनी जिंदगी जियेंगे और दूसरे को भी जीने देंगे.

मुझे समझ में नहीं आता तुम्हारी जिंदगी में कोई और लड़की क्यूँ नहीं है. Why can't you have a normal life ???  तुम्हारे अकेलेपन ने तुम्हारे चारों तरफ कोई अदृश्य घेरा बना डाला है, यहाँ तक की मैं भी उसे पार नहीं कर सकती..खैर तुम्हारी जिंदगी है-जैसे मर्ज़ी चाहे जियो लेकिन मुझे अपने तरीकों को आजमाने पर मजबूर मत करो pls !!

दूसरी तरफ फ़ोन पर राजेश cigerette  पर अपनी सारी कसर निकाल रहा है, जलने के बदले तो जलाने जैसा कोई काम बेहतर है.. - चलो ठीक है रचना तुम जैसा ठीक समझो.. तुम अपनी जिंदगी जियो और मैं अपनी तो जी ही रहा हूँ..

अब रचना की आवाज़ मोबाइल के स्पीकर से बाहर आ रही थी, एहतियातन राजेश उठकर केबिन से बाहर चला गया. ऑफिस के कोरिडोर में तेज़ कदम चलते हुए उसने फिर से डब्बी टटोली, अभी और जल सकती है.. रचना मानो सोमवार की सुबह को ट्रेफिक में फंसे मैनजर की तरह अब भी बड़-बड़ा रही थी जैसे अभी अभी उसे यही सब अपने HR , Seniors और फिर team को सुनाना हो-
जब भी मैं थोडा serious होती हूँ हमारी जिंदगी के बारे में, तुम्हें पता नहीं क्या हो जाता है??? सेंटी होकर मानो किसी खोल में छुप जाते हो? तुम बहरे तो नहीं हो गए हो ना??

नहीं रचना!! तुम्हारी बातों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ.. तुम्हें पता है ना मैं कोशिश  कर रहा हूँ.. (गार्ड बीच में टोकता है- सर, और कुछ मंगाना तो नहीं है? दुकानें बंद हो जाएंगी) अरे यार, १२.३० में मीटिंग भी शुरू होनी है.. रचना, मैं तुम्हें थोड़ी देर में कॉल बैक करता हूँ,,,,

कोई जरुरत नहीं है, I am going  to sleep .. गुड नाईट ... आवाज़ तल्ख़ नहीं थी, लेकिन रूखापन अजीब था.. राजेश के होंठ फिर से सूखने लगे थे- उसने गार्ड को आवाज़ लगाई- "एक डायट कोक और एक छोटी गोल्ड फ्लेक का पैकेट"..... क्या रचना को कोई और मिल गया है?? लेकिन मेरी तरह कौन उससे प्यार करेगा- पागलपने की हद तक.. लेकिन यही दीवानापन अब उसे चुभने लगा है!!? क्या सही में मुझे चीजों को बैलेंस करना नहीं आता? लेकिन रचना कोई चीज़ तो नहीं है और उसे बैलेंस करने की जरुरत ही क्या है- मुझे अपने आप को और बदलना होगा.... कोक का कैन खोलने की आवाज़ ने जैसे राजेश को नींद से जगा दिया- मीटिंग शुरू होनेवाली है...................    


To Be  Continued ...............

Sunday, 27 May 2012

भूख....प्यास.......कशमकश............


दो दिनों पहले अपने ऑफिस के चायवाले से हुई महज़ छोटी-सी बातचीत ने इतने विकट विचारों में उलझा दिया है.. बाबूजी 16 सालों से ये दूकान अकेला ही चला रहा हूँ, और तो कुछ कर नहीं पाया जिंदगी में लेकिन बच्चों को पढ़ा लिया, तीन लड़कों में से बड़ेवाले ने जबरदस्ती दकान पर आने की कोशिश भी की लेकिन मैंने उसको कहीं और नौकरी पर रखवा दिया. आठवीं तक पढ़ा है अगर हो सके तो उसको अपने ऑफिस में लगवा लीजिये, अच्छी चाय बनाकर पिलाएगा. पढाई पूरी करे ना करे आप सबसे काफी कुछ सीख लेगा-सुन, बोलकर आदमी तो बन ही जाएगा.. उसकी माँ दोहे सुनाते हुए बार-बार कहती थी, अगर बड़का अगर ठीक से पढ़-लिख लिया तो एक दिन बहुत नामी किताब लिखेगा. ऊ जो    राम बाबू लिखे रहें, ऊ से भी मोट....बेचारी चलिए गई बकते-बकते और उसकी पढाई भी खा गई.........  

कवितायेँ, उपन्यास, साहित्य, इतिहास, राजनीति......... भूखे पेट कोई किसी भी कला को सम्मान नहीं दे सकता... तो क्या शब्दों के सारे सिपाही भी अपनी-अपनी भूख से हारकर, ग़रीबों के दर्द बांटने के बजाए लालफिताशाहों और सियासतबाज़ों की तरह खूबसूरती की तारीफ़ और बुज़ुर्ग आलिम-ओ-फाज़िलों की अटकलों पर चलते रहेंगे?? कशमकश ने जबरन कुछ लिखवा दिया है .......

भूख  को
कविताएँ कतई पसंद नहीं होती
प्यास से
संगीत, अच्छे सिनेमा की बातें करोगे
ज़वाब में मिलेंगीं सूखी गालियाँ
मिहनत से
पूछकर देखना धीरज के बारे में
मुंह बनाकर आगे बह जाएगा पसीना
आदत से
ज़रा-सी नसीहत करके देखो ज़ब्त की
अक्ल और कुछ भी फेंककर मारने दौड़ पड़ेगा
क़िल्लत को
मंहगाई की वजहें समझाने पहुँचो
नैतिकता और बराबरी का उल्टा ब्रेनवाश हो जाएगा
ग़रीबी से
मत पूछना इन्द्रधनुष में खिले रंगों के नाम
शरमा जाओगे अपनी अकर्मण्यता और
अपने ही पुरखों की वहशियत याद करके

रगों में बहते तुम्हारे खून का रंग
अक्षरों के रंग में मिल जाएगा
वोही एक ही रंग
जो अमीर-ग़रीब में फरक नहीं करता
इंसानी रगों से बाहर आते ही
सारे रंग यूँ ही जम जाते हैं
शराफत की काली मिटटी में दबकर या
खुदपरस्त मजबूरियों की काली राख होकर.......................

Wednesday, 23 May 2012

बड़ी मुश्किल से

चलो आप कहते हैं तो नहीं सोचता 
उन सालों के बारे में 
जो लौटकर वापस नहीं आयेंगे..
मैं नहीं सोचूंगा उन ख्वाबों के बारे में 
जिन्हें देखने के लिए 
मैंने एक अदद आँख उधार ली थी
अपनी दूसरी आँख के साथ मिलाकर
जोड़ा बनाया था ना
नहीं सोचूंगा उन रातों के बारे में
जिनके धागों में मैंने यही ख्वाब पिरोये थे
मैं चाहता ही नहीं हूँ आजादी
बड़ी मुश्किल से
अपने आवारा हाथों को बाँधने के लिए
वक़्त की रस्सियों पर मैंने इतने बल दिए थे
इतने बल की मेरी खुद्दारी भी ऐंठ जाये
रगों में उठे और गले में बैठ जाए
मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है
ना तो इश्क के ज़ज्बे से
नाही रूमानियत से
मुश्किल बस एक ही है
ज़रा वक़्त देख कर इस सरूर को सर चढ़ना था
मैंने इलाज-ए-मजलूम आशिकी पा ली है
ज़रा अपने ज़ज्बातों की हैसियत
और अपने चेहरे की कैफियत सोचकर रुकना था
लगाम देना चाहिए था सरफरोशी को
लीक से कुछ अलग हट कर करने के जूनून को
सब कुछ ख़तम हो गया इस भरम की जरूरत
हर रोज़ नए अफ़साने लिखनेवालों को होगी
मैंने तो शुरू भी इसी से किया है
और ख़तम भी यहीं करूँगा.
नहीं, आप फिर गलत समझे
ये क़दावत नहीं, नाही शिकायत है
मेरे ज़हन के कुरआन छपी हुई
एक ही चुनिन्दा आयत है..
या तो मैं अहल-ए-खुदा की असलियत
सवाल रख दूँ फरिश्तों से,जो सुनें
या फिर आप जैसे पढने-सुनने वालों की गनीमत है..

Sunday, 20 May 2012

मुआवज़े...........


मुआवज़े चुकता नहीं होंगे
ताउम्र
हिसाब हमेशा चलता रहेगा..
यादों का
जो भी मुस्कुराहटें
वजूदों ने खरीदीं-बेचीं
लम्हों-ज़र्रों की कलम से दर्ज रहेंगीं

रंग-बरंगे
glitter पेन से लिखे कार्ड
और हंसता हुआ-सा बौड़म खरगोश
अहम्कानी फितूरों की वो रातें
बालकनी में छुपी चाँद से मुलाकातें

संभाल कर रखता चला हूँ
अपने wallet की छिपी हुई जेब में
कोई तस्वीर...
या लड़कपने की खुश्बुनुमाँ चिट्ठियों की तरह..

तुम कहो तो सही..
ज़ज्बातों को परे ही रख दूँ लिखते हुए
ज़रा सोचना गर
तुम्हें पढ़ते हुए ख़याल आ जाए

ज़न्नत को ज़मीन पर उतार लेना
चंद लफ्ज़
आवारा तसव्वुर से उधार लेना
खुश रहना
क्यूंकि मायूसी
हारनेवालों की महबूबा है

आज फिर निकला है आफ़ताब
जलने की आफ़त सर लिए
कल ना जाने थककर
किस छोर पर डूबा है........

क्या डर है उन्हें,


उम्मीद के दीयों की बीनाई
कब्जाने के फ़िराक में
खालिस जलने का ज़ज्बा सिखाते
बड़े-बुज़ुर्ग, आलिम-ओ-फ़ाज़िल
क्यं भूल जाते हैं
चिरागों के तले ही तीरगी छुप जाती है...

क्यूँ नहीं सुलगने देते हैं हर बाती को
बिला खुदपरस्ती के तेल भर कर
क्या डर  है उन्हें,
की कंक्रीटों के बसाए उनके जंगल
जला डालेंगीं कमसिन बेबाक चिंगारियां...

यक़ीनन उन्हें गौर करना चाहिए था
की बेचने के लिए जो भी कुछ बोया था
खाद की तरह इस्तेमाल की गईं
मजलूम ख़्वाबों की लाशें
रूह बनकर लफ़्ज़ों की
ऐसी आंधी-तूफ़ान बनकर आएंगीं
हवा देकर जलाती जाएंगी
इक नई शाख को
हर बार अपने बुझने से पहले....

खौफ़ भी नहीं खाते हैं क्यूँ
मजलूमों के दर्द-ओ-ग़म बेचते हुए
भूख से मारों को दूर से रोटी दिखाते हुए
जिस किसी भी दिन बगल में
सड़ते हुए अनाजों की बदबू में
छुपकर बैठे हुए मोटे आदमखोर चूहों पर
गंध घुस गयी अगर
नए 'मुसहरों' की नाक में
याद दिला देंगे अपनी जात की असलियत...

झुठला देना भर या भूलकर
अपनी, हाँ अपनी-ही बीवियों-बच्चों को
सूखे होठों और सूनी कलाईयों को
शिकार करके मोटे-पतले चूहों को
मिला देगा सारे गोदामों में
सल्फास की गोलियां चूरकर
बचा लेगा वो अपनी जात
और मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने वाले
सारे शाकाहारी तक मारे जाएंगे
.........



वक़्त बदल रहा है.....

वक़्त बदल रहा है
बुजुर्गों की हिदायतें बदलनी चाहिए.
सही-गलत दलीलें, तमाम किताबें भरीं हैं
वक़्त बदल रहा है
दुनियादारों की कवायदें बदलनी चाहिए

किसके पुरखों ने कौन-से गुनाह किये है
किसने मंदिर-ओ-मस्जिद सब तबाह किये है
वक़्त बदल रहा है,
माज़ी-ज़हनों ज़बरन भरीं, तिजारतें बदलनी चाहिए

वो बाँट देते हैं और हम बँट जाते हैं
अपने-अपने हिस्से, तारीफें छांट लेते हैं
वक़्त बदल रहा है
लफ्ज़-शराफतों की शिकायतें बदलनी चाहिए
 
पूँजी-दाराना सियाह रातें
ग़ुलाम-ए-खमीरी चिरागों रौशन ना होगी
वक़्त बदल रहा है
ख़ाक-चिंगारियों की खिलाफतें बदलनी चाहिए

अबके ज़वान हो कलम से
कुछ हकीक़त की गफ़लत करो
बजाये ख़िलअत-ए-इश्क सजाने
असलियत के नंगे जख्मों, ज़माने के नेमत करो
वक़्त आ गया है शायरों!!
इल्म-ए-शायरी रिवायतें बदलनी चाहिए..