Monday, 30 April 2012

सिर्फ मेहनत करने वालों के लिए..

मेहनतकशों के आलिम-ओ-हाफिजों को सलाम
ना लाल, ना पीला, सबको बेरंग सलाम
मेहनतकशों की ख़ुशी का दिन है
मेरी बेमतलबी की बेबाक मेहनत, इक और कलाम

रूह तो कांपती ना होगी तेरी
अपने ही चेले चपाटों को देख कर
नाम तेरा, चर्चे तेरे
क्यूँ जीत जाते हैं ये खुदपरस्ती के गुलाम

कितनी हीं लाल रिसालें
खुद अपने हाथों जला डालीं
क्या करता अकेला था
और शख्सियतबाज़ी की दीमकें
खाए जा रहीं थीं मेरे कमसिन ज़ेहन को

ज़रा भी अंदाजा रहा होता तुझको
की लाल को मजलूम-खून का रंग समझ लेंगे
मेहनतकशों को तुने झंडा नहीं दिया होता
मेहनती औजारों को हथियार बना लेंगे
मजदूरों की प्यास पसीने से बुझेगी ना

मुआफ़ करियेगा सियासतबाज़ों
लेकिन अगर आप के पास
दुनिया को चलाने और बचाने की और तरद्दुदें बाकी हों
कुछ और लफ़्ज़ों को गले घोंट दीजिये, कहिये

"तुम मुझसे क्या बात करोगे, तुमने कहाँ दुनिया देखी है
जिस राह चलेगी और बचेगी दुनिया दौलतमंदों की नेकी है.."


और आखिर में मेरा जाती तजुर्बा
कुछ एक लाल-किताबों को अनजाने में पढ़कर:

मेहनत करने वाला अगर खिलाफत करेगा
निजाम हाथ में लेगा दुनियादारों की गनीमत करेगा
बड़े मीर कहते हैं अब
आजकल की दुनिया में कुछ भी गैर-मुमकिन नहीं
मैं देखता हूँ ख्वाब इक-इक मजदूर उठेगा कब्र से
सिर्फ हौसले भर से ही दौलत्बाज़ों की फजीहत करेगा..

Sunday, 29 April 2012

इतना आसां क्यूँ नहीं??

सुनना, बोलना और लिखना 
इतना आसां क्यूँ नहीं 
अम्ल ज़ज्बातों पर अमल करना

चलना, थकना और रुकना
इतना आसां क्यूँ नहीं  
ज़िंदगी का मौत की तरफ  बढ़ते रहना

आना, ठहरना और चले जाना
इतना आसां क्यूँ नहीं 
लहरों का साहिल पर टिके रहना

देखना, याद करना और फिर भूल जाना
इतना आसां क्यूँ नहीं 
हर नज़र एक ही मंज़र का रुके रहना 

पढ़ना, गुनगुनाना और गम हो जाना
इतना आसां क्यूँ नहीं 
उसी ग़ज़ल का होठों पर गिरते रहना 

लेना, देना और हिसाब रखना
इतना आसां क्यूँ नहीं  
कुदरती नेमतों को यूँही बिना तोड़े रखना

तौलना, खरीदना और चुकता होना
इतना आसां क्यूँ नहीं 
दुनियाभर की मुस्कुराहटें उधार लिए रखना 



 

Saturday, 28 April 2012

मैं भी..........

मैं भी
संगदिल खलाओं के रास्ते चलकर आया हूँ
गिनती कदमों और उनमें
काटों की अब तक नहीं कर पाया हूँ
रात सिरहाने
चंद अजनबी ख्वाब मिले हैं
सुबह कहती तू चलता जा
मैं तो तेरे सरमाया हूँ..

मैं भी
खशबुओं का बोझ साँसों उठा लाया हूँ
तमाम रास्ते इत्रबाजों से
लड़ता-भिड़ता, भागता हुआ आया हूँ
सुस्ताने बैठो
कितनी और रुंदी कलियाँ मिले हैं
आसुओं से प्यास बुझाता जा
मैं तो वैसे भी ज़ाया हूँ..

मैं भी
अपनी लाश दो ही कन्धों पाया हूँ
जब कभी जीने की रौशनी
लरजती खौफनाक माज़ी, घबराया हूँ
कब्र ढूंढ रहा हूँ
हमसफ़र सारे और ही कब्रिस्तान छुपे हैं
मौतें सारी लफ़्ज़ों में छुपाता जा
मैं भी तो सुनने आया हूँ..

मैं भी
तन्हाई-ओ-तल्खियत का हमसाया हूँ
रूमानी, इंसानी होने की कोशिश
नामुमकिन लफ्ज़ रास्ते में भूल आया हूँ
शुरुआत कर चुका हूँ
बेहतर दिलासे, बस साथ देता जा
मैं भी हसीं-खाब नेमतें लाया हूँ................


Friday, 27 April 2012

अर्ज़ है.... (३)

रिश्ता, ज़ज्बातों की दावत है
ज़रूरतों में पकता है
इसरार-ए-गुनाह परवान चढ़ जाए
ज़माने की थाली में सजता है

आँखें, खुलूसों की सजावट हैं
नीयत से बहती हैं
जो चाहो समंदर भी दिख जाए
हर ज़र्रा चमकता शीशे-सा दीखता है

आवाज़, लफ़्ज़ों की लिखावट है
होठों पर जिंदा है
मुसन्निफ़ कोई तो कान लगाए
सूफी, ग़ज़लें गाता हुआ थकता है

अदाएं, हुस्न-ओ-नाज़ की मिलावट है
लम्हे-नखरे शर्मिन्दा हैं
खूबसूरती कहाँ तक करार पाए
तारीफें करते-२, शायर नहीं रुकता है

मुहब्बत, फ़कत एक कहावत है
बुज़ुर्ग-अफसानों से राब्ता है
वफ़ा-ओ-ज़फ़ा का फर्क कर पाए
ख्वाब को हकीक़त से क्या वास्ता है

ऊब, ज़बरन जीने की कसावट है
दिलचस्पी से हांफता है
ख्वाब-ए-तसव्वुर ज़रा घूम कर आए
आदतन आवारा दिल कमरे में कहाँ टिकता है.....

Thursday, 26 April 2012

बिना मौसम की बारिश!!

बिना मौसम की बारिश में
चटपटी-सी आवाजें उछल रहीं थीं
रेहड़ियों, टिन की चद्दरों, तिरपालों पर
थोड़ी मस्ती और गोलगप्पे का तीखा पानी
आज के मज़े भीगते हुए ले लो
कल की सेहत की किसको पड़ी थी....

बिना मौसम की बारिश में
शर्म सहम कर, बहाने से
छुप रही थी गीले दुपट्टों में
देर हुई घर पहुँचने में, तुमने देखा नहीं?
बड़ी जोर की बिजलियाँ  कड़क रहीं थीं
खैर!! एक-दो पाँव डूबी पुरानी सीढियाँ
घंटों तुम्हारे आने का रास्ता देख रही थी...


बिना मौसम की बारिश में
लगातार दफ्तरों से छूटे सिक्कों के कैदी
नोटों के नाव में चढ़कर भी मज़ा ना कर पाए
अक्सर जिन गड्ढों के लिए
नगरपालिका गालियाँ सुनतीं हैं
आज अल्हड़ों को कितना मज़ा दे रही थी...


बिना मौसम की बारिश में
सड़क के बीचोबीच क्यारियों में
बाएं पैर के जूते से बना एक निशान
लम्हों-नज़रों की गिलहरी कूदी- छपाक!!
इतना हल्का वज़न और
हाथ-भर दूर उछल कर गिरीं छींटें
थोड़ी-सी और बरसी होती
धुलने को तैयार थीं तंग-गलियाँ
उदासी की उमस अबतक चिपचिपी हो रही थी..........


Tuesday, 24 April 2012

गुजरे..........

गुज़री कितनी जिंदगी,
कितने हमसफ़र गुजरे
तसव्वुर की फैली चांदनी,
टूटते तारों चमकती रौशनी
कितने रहगुज़र गुजरे

चाँद-चेहरे पे कोई दाग है
शुबहों को तीरगी घेरे
परछाईयों के साए भागती
सोच में पड़ते हुए सवेरे
घड़ी के साथ चले, दिन-भर गुजरे

शाम शर्मा गईं गरूर से
आब-ए-खला, जिंदा सरूर से
रूठ बैठी शब्-ए-फुरकत 
आँखों ख्वाब के बादल घनेरे
बूँदें,चेहरे पर दरया, समंदर गुजरे


खामोशी सुनसान काबिज़ है
साँसों की आवाज़ नाजायज़ है
परत दर परत उतरती उबासी
हकीकत से कब-तलक छुपेगी
बीनाई बनकर दो बाब हमनज़र गुजरे


सिर्फ जुगनुओं की सदा है
तीरगी कहाँ तक रुकी रहेगी
माज़ी के पन्नों कब तक
तुम्हारे इंतज़ार के बहाने लिखेगी
सकूं-ओ-नींद से हासिल पल भर गुजरे



"पहचान"


यूँ तो मेरे कई चेहरे कई नाम हैं,
गौरतलब होगा कि तुम्हें किससे काम है.
हमने देखें हैं बाज़ार, रौनकें भी देखीं हैं,
अब हमसे ना कहो यहाँ ज़ज्बों के क्या दाम है
कितने हैं अल्लाह के बन्दे यहाँ
कितनो की ज़ेहन-ओ-जुबां में फर्क नहीं
अजां-ए-ईमान उठाने बचे कुछ सच्चे मुसलमान हैं.
समझ नहीं आती गर अपनी जरुरत
इस्तेमाल करने की भी हमसे नहीं हिम्मत
मोम सी हुई ज़िन्दगी, दश्त-ए-तन्हाई ईनाम है.
सबर करो, उम्मीद-ए-सहर ज़रूर आएगी
ज़ब्त करो वो ज़न्नत ज़मीं पर लाएगी
हलक घोंट दो गले मासूमों के, उसी खुदा का पैगाम है
तारीखें बदलेंगी सारे इंतजामात चलते रहेंगे
ज़बां-ओ-मज़हब के नाम तमाम जलते रहेंगे
जीतेगा तो हमेशा आलिम ही, अरबी में लिखी कुरान है.
हम हो जाएंगे सूफी, आवारा ग़ज़लें गाएँगे
किनारे बैठेंगे रहगुज़रों को रास्ता दिखायेंगे
बिना पढ़े इक आयत छपी ज़हन में, साफगोई हराम है.
तुम हमकौम दोस्त मेरे इक ज़रा करीब आकर देखो
और तुम भी,इक ज़रा हाथ लगाकर देखो कभी
ज़हन का चश्म ही मैला है या सच  में इंसानियत इलज़ाम है......


Monday, 23 April 2012

सुबह-ओ-शाम...

'सुबह' की शान में
झूठे कसीदे पढना कैसे वाजिब
उसकी चाल सिर्फ फुर्तीली होती है
मटकती है वो गर
सिर्फ 'दिन' की लज्ज़त बढाने को
सरफिरा बीतेगा नहीं
हमनशीं शाम कब आएगी..
रास्ते और मंजिल टिके रहते हैं
दो-चार-दस-बीसियों साल, लगातार
किनारे फूल लगाने की जद्दोज़हद क्यूँ
पानी देने की ज़िम्मेदारी पैदाइश की नहीं है
अकलियत की खाद या ज़हर
मिला जड़ों में  दरख्तों की
और बरपा पत्तियों पर क़हर
तोड़ने वाले, तोड़ कर मसलने वाले
चुराते रहे हैं बेबाक कलियों से नज़र
टालना बारहा उनका सवालों को
वाजिब नहीं इस उमर में तन्हा सफ़र
काश के बागबां ने उंश रक्खा होता
ज़मीं का बदन रौंदना
भूख मिटाने की जिद्दत में
फिरंगी तितलियों को टोका होता
वो आठवां रंग दिखा गईं इन्हीं कलियों को
फिज़ा ने सातों पहले ही बाँट दिए थे आसमां को
डर तीरगी से नहीं सफेदी से रहा भँवरे को
रंगों को तो फिर से कोई भी भर देगा
दाग़ सफेदी के पर से मिटाने आसान कहाँ
गटठरें बांधकर नन्हीं पीठों पर
भेज दिया नामचीन 'धोबीघाटों' पर
पीट-पीट कर चमकने के लिए
मुस्तकिल जोरदार ठोकरें
बदन से उतरकर जिद्दी दाग़
ख्वाब-ए-दोज़ख रात
कमउम्र जुगनुओं को सताते हैं
रवां होते हैं शिकार होते हैं
कुछ-एक गिरफ्तार-ए-सरूर होते हैं
मौत आती नहीं है उनको
शाम खुशामदगी चाँद की नहीं दिखती
शब्-ए-फुरकत की आमद
गुजरे हुए दिन को शर्मसार करते है................

Sunday, 22 April 2012

बनो..

वोही ज़ज्बा जिसकी खुशबू में सारी कायनात महके है 
तेरे ज़ेहन में पल भर को ही टिके, इत्र नहीं इश्क है कपूर
काटना ही तो है लम्हों को लरजकर बाँट दें फिज़ा में
आवारगी-ओ-शायरी सिफ़र करें अच्छा होने का गरूर...

आप मांगें न मांगें वाइज़ सलाह मुफ्त करेगा 
फ़ालतू वक़्त ज़ाया करें आप? न करें, मैं लिखूंगा ज़रूर.
मैं यक़ीनन ग़ालिब नहीं, खुदा भी नहीं
आप हैं शायद लफ्ज़-ए-ज़न्नत-ए-ख़मीरी कोई हूर
मुआफी गर एहतराम ना हो पाया,होने का मुझसे
पेश-ए-खिदमत है, इक बददिमाग शायर हूजूर...



ना मासूमों के दर्द को देखो
ना ही तुम समझदार बनो
गर सुकूं से जीना है
दो-चार किताबें पढो, दुनियादार बनो

मजलूमों के दर्द से पिघलोगे
तुम पक्का बाकियों से पिछड़ोगे
अब भी तुमसे कहता हूँ
सिर्फ अपने मतलब के तावेदार बनो

बेकार है यूँ ज़ज्बाती होना
आंसूं दिखे नहीं कुछ ऐसे रोना
मुलम्मा जीने का आँखें करो,
वहशियत ख्वाबों में लिए ख़ुशगवार बनो

तज़ुर्बा मीर शख्सियतों का होना
रियाकार तुम झूठी कलम का होना
चाँद तारों की दुहाई नहीं देता
औरोंसे पहले तुम खुद के मददगार बनो

दम रखना तारीफों की लज्ज़त छुपाने
कोई तुमको कहे 'काफिर',
पहले उसको ही 'बुत' कहना
मौकापरस्ती सीखो और सियासतदार बनो

वो सिर्फ खुदा है, ईमान-ए-पाक़ है
उसने ज़वाब-ए-इश्क जाफा मांगी थी
ख्वाबों के जाम तोड़ो हिम्मत से
मुफत की रोटी तोड़ो इंसानियत के सरदार बनो


 

  Image  Courtesy - EMPIRE, acrylic on canvas 


रात भर...


उनसे बातें करना रात भर,
आस्मां में तारे गिनना रात भर,
भरोसे ने तेरे संजीदगी दी, मुझको,
नाकाबिले- मंज़ूर रिश्ते का,
उधार चुकाना रात भर.
उम्मीदों का सर पर अपने बोझ है,
इंसानी मजबूरियों का सामना भी रोज़ है,
वक़्त की रौ में भटके हौसलों का
मकान बनाना रात भर.
कल हम मिलें तो शायद
चेहरे न पहचाने जायेंगे,
कदम उठ्ठेंगे, और दुनियादारी में जकड़े जायेंगे,
ऐसे ही अजीब सवालों में,
खुदको जलाना रात भर.
बंदिशें ख़त्म होतीं हैं,
न तुम ठहरे न हम,
जमाने भर से लोहा लेने का,
हौसला रहा न कम,
लेकिन असलियत की अमावस रात है,
यादों के जुगनूँ, जलना रात भर,
तुमसे बातें करना रात भर,
आसमान में तारे गिनना रात भर...............

Image - Google 

Friday, 20 April 2012

बहाना है..

बेतरतीबी में भी ख़ूबसूरती होती है,
वरना तो ये एक महज़ बहाना है
तारीफ़-ए-हुस्न कोई खुशनुमां ग़म
चेहरे के तिल का ऐब छुपाना है.
वो जो कहते हैं, तामीरी पुरखुलूस नहीं
ज़ज्बातों की शायर लफ़्ज़ों में
इतनी नादाँ क्यूँकर है रात,
टूटते तारे से जलती बुझती है
क्या उसको नाम कमाना है
ना करे शिकवा शय सदी से,
ना गिला लम्हों को गुजरते वक़्त से,
हमद-ए-ज़बां है बेशरम
फिज़ा आधी नंगी है बेबाकी का ज़माना है.
ऐय्यारी-ए-अशआर-मुहब्बत कभी
तुमभी नज़र करो चिलमन-ए-ख्वाब
साहिर-ए-नज़्म गुमनाम सही
इश्क-ए-शम्मां,मुरीद इक और दीवाना है
वाइज़ लापरवाह ही रहे मुमकिन
ग़म-ए-शौक-ए-आवारगी से
वरना हमगरीब, हमशौक, हमखला
बेनज़ीर ग़ज़लों का कोई और ठिकाना है?
हिचकियाँ लो जो कभी मय खला के
सरूर-ए-इश्क करोगे तौबा यक़ीनन
रंगीं अल्फाजों की महफ़िल,
शदीद-ए-खुदी से मयस्सर मयखाना है
मैं कहूंगा और तुम मानोगे नहीं
बाद जलने के पर-ए-तसव्वुर
कमसिन कन्धों बारहा सख्त उगे
ग़ज़ब खुदा-ए-ख़ाक वो बेफिक्र परवाना है
अबके आएँगे तो नक्शा बना लाएँगे
रूह-ए-जां-ए-इंसानियत की मज़ार को
कोशिश-ए-दुनियादारी की चादर लेकर
कौनसे मोड़ ठहरना है और किस राह जाना है
जाने इस नज़्म को किसकी आह लगी
मुस्तकिल बढती चली जा रही
दिलरुबा शरारा-ए-तसव्वुर अब
दो पलक ज़रा आराम दे,सुबह फिर आफ़ताब सर आना है
नापसंदगी फिर से ज़ब्त करना
मेरा इम्तेहान-ए-शौक सिफर करना
समझ लेना तरकश के तीर ख़तम
नज़्म ये भी अदद नींद की खुदगर्जी,छुपाने का बहाना है


Image Courtsey - Bird perched on rocks, Mughal painting, c. AD 1610; in the State Museum, Hyderabad

Wednesday, 18 April 2012

कदर.........

बाग़-ए-बहार के जानशीं कदर
जो 'पत्ते' शाखों से टूटते हैं
हरियाली की हमदम
हवा भी सहलाती नहीं उन्हें
वक़्त के साथ उड़ा ले जाती है

गुलदान बेहतरीन भले चुन लो
वाइज़ पर भरोसा न करो
आब-ए-जुनूं खुद रोज़ बदलो
जो 'कली' शौक से तोड़ी थी
आधी पढ़ी किताबों में छुप जाती है

खिज़ा न आये ग़र बारहा
अश्जार नंगे न हों कभी
गुमाँ कमसिन 'बेलों' का न टूटे
बढ़ते लरजते देखकर उसे
हिलायत-ए-शज़र क्यूँकर मुस्कुराती है

वहशियत से देखो 'काटों' को
मकतूल तितलियों के पर टंगे हैं
रकीब है वो या हाफ़िज़ है
रंगीं पंखुड़ियों की निगारिश
नापाक उँगलियों में चुभकर बचाती है

बेगारी से घबराए हुए
कच्चे-पक्के 'यादों' के फल
बेतकल्लुफ लदे नहीं रहते
ईमान भारी हो जाता है वजूद पर
उमर जब पक कर रंग लाती है

कदर= उसूल; आब-ए-जुनूं= water of Passion ; हिलायत-ए-शज़र= story of the  land ; निगारिश= beauty ;

Image Courtsey - google

Tuesday, 17 April 2012

मिले...

कोई सूरत, कोई सीरत, 
कोई ज़िस्म, कोई ज़ीनत
कहीं खमीरी से मुंह मोड़ती है?- मुहब्बत 
हर ज़र्रा इक-दूसरी मायूस शक्लें, कोई बेलौस निदा तो मिले 
काफिरी छोड़ मुसलमाँ हो जाएँ 
बजाये खानाबदोशी, 
उम्मीद-ए-सहर की गज़लें गायें  
ज़बां-ओ-ज़ेहन में फर्क न हो जिसके,कोई दीगर खुदा तो मिले 
नक्कारों की दुनिया में बेकारे शहजादे 
यूँही मिसरों से बांटते रहे 
मदहोशी-आवारगी का मुदावा आते-जाते
अशआरों ठहाके लगानेवाली, कोई हसीं लफ्ज़-ए-इदा तो मिले 
आप नज़र करें, आपकी ख़िदमत है
यूँ तो वफ़ा-ज़फ़ा सब तिलस्मी खिलअत है
कुछ देर पहनकर उतार देती है रूह 
जां-ए-रूह, बेवफा ही सही महबूब कोई हमशौक-ए-इब्तिदा तो मिले 


  ज़ीनत= Beauty ; खमीरी= materialism ; निदा= call ; लफ्ज़-ए-इदा= words of happiness ; खिलअत = clothes ; हमशौक-ए-इब्तिदा= same hobby of inventing /exploring 


Sunday, 15 April 2012

बदल जाते हैं....


वक़्त के साथ इंसान बदल जाते हैं,
मज़हब-ओ-नाम क्या, ईमान भी बदल जाते हैं

कोई कैसे कहे बेवफ़ा हुस्न-ओ-नाज़ को
रुख़ हवा का देखकर, हम और आप बदल जाते हैं

ज़िन्दगी का सफ़र, सही-गलत फैसलों की मंजिल
राहें रोज़ बदलती रहीं, कभी हमकदम बदल जाते हैं

बीनाई कुछ और नहीं दरमयां दूरी का फलसफा
दरया-ए-रेत,वोही निगारिश, करीब से मंज़र बदल जाते हैं


इंसानी फितरत किया है उसने चलते-बदलते रहना
माज़ी का मुदावा करते-करते, मुस्तकबिल बदल जाते हैं

ईमान मर्ज़ी से मंसूब कर दें गर बुत को तो इबादत
ज़बां-ए-हम्द इलाकों बदलती रही, पैगम्बर भी यूँहीं बदल जाते हैं


बीनाई- देखने की क्षमता; निगारिश- खूबसूरत; माज़ी=भूतकाल; मुदावा=इलाज़; मुस्तकबिल= भविष्यकाल
मंसूब=समर्पित;  ज़बां-ए-हम्द=प्रार्थना की भाषा

Image Courtsey = Google

Saturday, 14 April 2012

आज शाम यूँही कुछ आम लिखा हमने!!

शब्-ए-फुरकत की सियाही फिर दाग़दार चाँद लिखा हमने
आज फिर तुम ना आईं खिड़की पर उसे ही टांग दिया हमने

कैसे आँखें खुलीं रक्खूं बेगैरत हरूफें मुस्तकिल बहे हैं
आब-ए-खला-ए-वहशत आँखों से गिरी, लबों पर थाम लिया हमने

यूँहीं बसर हुई जाती, वुसअत-ए-कतरा-ए-मुहब्बत
दिल-ए-नादां तेरे संगरेज़े वक़्त की दानाई के दामन बाँध दिया हमने 

कभी फुर्सत में बैठी कोई शाम आ जाए यक-ब-यक मिलने 
जिस्म-ए-आवारगी की लरज़, हाफ़िज़-ए-ख़ाक तुझे ही इलज़ाम दिया हमने

अबके सावन कोई शऊर-ए-ज़ब्त मुफ्त बांटेगा दर-दर 
नक्श-ओ-निगार मौसम-ए-वफ़ा के, हिर्स-ए-तवज्जो के नाम किया हमने

समा'अत साथ न देती कभी रफ़ाक़त-ए-सुरूर नामंज़ूर 
शिकवा-ए-शीशागर भी लाजिम, अल्फाजों को यूँहीं बदनाम किया हमने
  
दुआ करो तुमभी साथ मिलकर के ज़बां से उफ्फ़ न निकले
अबरार-ए-खमीरी के ख़ालिस-मोमिन असरारों को सर-ए-आम किया हमने

अश्जार-ए-खला उग आये जो ज़ेहन के सहन-ओ-मकाँ     
यास लम्हों की टहनी बनाकर ख़ामा, मासूम शिकवों को दिल-ओ-जाँ लिखा हमने


मुस्तकिल= लगातार; वुसअत-ए-कतरा-ए-मुहब्बत= प्यार के बूँद का फैलाव
संगरेज़े= पत्थर के टुकड़े; दानाई=अक्लमंदी ; जिस्म-ए-आवारगी= झूठ की देह; हाफ़िज़-ए-ख़ाक= ख़ाक की हिफाज़त करनेवाला(खुदा); शऊर-ए-ज़ब्त= धैर्य का सलीका ; नक्श-ओ-निगार= features ;  हिर्स-ए-तवज्जो= greed  of  attention ; समा'अत= सुनने की क्षमता ; रफ़ाक़त-ए-सुरूर= नशे का साथ; शिकवा-ए-शीशागर= शीशा बनानेवालों की शिकायत; अबरार-ए-खमीरी= भौतिकता के पुजारी; ख़ालिस-मोमिन= worthlessly  sacred ; असरार= राज़; अश्जार-ए-खला= अकेलेपन का पेड़; सहन-ओ-मकाँ= घर और आँगन; यास= उदास; ख़ामा= कलम         

Image Courtsey - Google 


Wednesday, 11 April 2012

रोमीओ और जूलियट!!!!

दोपहर की धूप में सूखती
पार्क की बेंच पर
दो नन्हीं सुनहरी मछलियाँ 
क्रिकेट खेलते आवारा लड़के
आशंकाओं से इतना लगाव 
गेंद आकर मेरी नाक पर ना लग जाये

प्लास्टिक की थैली में बंधीं
तुम-दोनों मुझे माफ़ करना 
अब ये खेल नहीं देख सकतीं तुम

कुछ देर छुपा कर रख रहा हूँ 
अपने फटेहाल बैग में

अब तो तुम-दोनों 
सही जगह पर पहुँच गयी हो
मेरे सिरहाने
रोज़ सुबह पहली आँखें
देखेंगी सुख-समृद्धि, खुशहाली

तुम-दोनों को पता भी नहीं चला-ना?
चार्ल्स डार्विन की theory पढ़ कर 
मैंने अपनी जिम्मेदारियां 
चार दानों के साथ डाल दीं हैं
अब तुम्हारा survival जुड़ गया है 
मेरे human  होने के लिए 

अब तक समझ नहीं आया?
एक काम करो 
रोमीओ की पूँछ पर Nail Paint 
और जूलियट पर थोडा Colosal लगा दो
कहीं मेरी जिम्मेदारियों से मर गयीं तो 
इनकी हमशक्लें ना लाकर डाल दूँ 
तुम्हारे घर आने से पहले..........


Monday, 9 April 2012

अर्ज़ है..

सब भूल जाते है, पीछे के पढ़े पन्ने
उलट देते हैं सारी अकलियत सभी 
अपने  हाथ भी अभी, उमर की पतली किताब है

दिल्लगी किसी शहजादे ने की 
पैमाइश दी, मुहब्बत को दौलत की
हाथ काटे  तो संतराशों के थे उसने  
आज कितने गरीब आशिकों का खाना-खराब है

उपरवाले ने तो ज़मीन दी ही थी चलने को
नज़रों को खुदगर्जी से करो हल्का
फिर चाहे जिस मर्ज़ी पे चल दो, लीकें बेहिसाब हैं

तौल-तौल कर कमतर कर देती किस्मत हसीं लम्हों को
दोबारा से रटे हकीकत के पहाड़े जिंदगी
गर्द-ओ-ग़म ,शब्-ए-फुरकत का, बड़ा लम्बा हिसाब है   

परे रक्खो वफ़ा की ग़फलत, ज़ेबाइश दिल्लगी की कम ना होगी
अजनबी अशआरों के ज़ाम तोड़ो वाइज़ पर
शायरी करते रहो, कहते रहो- ये कैसा हिज़ाब है....

हंसीं खेल!!


बहारों का मौसम है
मिल जाती हैं आजकल
रूह-ए-पाक
बेवक्त तन्हाईयों के ज़ीने पर
लुकते-छिपते 
वो जो खूबसूरत भी हैं
और खुशनसीब भी...

घबराओ नहीं! 
जल्दी से छुप जाओ 
वजन थाम लेंगी 
इन खुद्दार ईंटों पर 
जीतने की बदगुमानी का रंग नहीं 

हूर-ए-ज़न्नत की आमद-बरामद 
सिर्फ रंग-ए-लहू गहराती है
हार की इल्म-ए-हकीकत
कमनसीबी का शौक इतना बुरा भी नहीं
के मंजिलों और हुस्न्बाज़ ज़माने की छतों तक
बिछते-छिपते रहने की दिल्लगी को 
आदत का नाम दे दिया जाये 

ये दबिश-ओ-दलीलें  
खुदपरस्ती की जेब से गिरे
किस्मत के खोटे सिक्के हैं
संभाल कर खेलना जब तक जी करे 
खुशियाँ खरीदने की नादाँ कोशिश
सिर्फ मेरे-तुम्हारे नहीं,
मजाज़ियों के भी 
हसीं खेल का मिजाज़ बिगाड़ देगी....

//निराशा//


मचल जाए तुम्हारी पलकों पर नींद 
ज़बड़े मेरे उबासी में ही खुलते हैं

छोटी मुलाकातों की कुछ हसीं निशानियों के शहर 
ढूंढना चाहे या न चाहे रास्ता भटका हुआ मुसाफिर

ज़िन्दगी बेतरतीब जीती गयी खुदको 
सलवट पड़ी हो चादर पर तो क्या वो बिस्तर नहीं

रात ने आंधी को टोका नहीं बस्तियां उजाड़ने से पहले
सुना है घर जिसका बच गया था वो तो पहले से ही फकीर है 


कुछ चेहरे सूरज-की सी रौशनी लिए होते हैं
अगर अँधेरे कमरे में इक छेद कर दो फिर तो दिख जाएँगे 
बाहर उजाले में सिर्फ इन्द्रधनुष ही आकर्षित करते हैं

अपेक्षाएं, लड़कपने की पतंग
ज़ब्त की खेंच, अपनी ओर हल्का झटका
निराशाओं की उड़ान और ऊँची उडती चली...........


अपनों का सपनों से छत्तीस का आंकड़ा..

रिवायत-द्नियादारी की फ़िक्र
लाजिम है "अपनों" को
हर वाकये को समझने के लिए
सही-गलत की कसौटी पर कसते हैं "सपनों "को

"अपनों" की परवाह मंजिल-नसीबी की
चलने का मज़ा छीन लेती है
"सपनों" के रास्ते की मुंह की रोटी


"अपनों" की अनदेखी से आहत
"सपनों" के मुलायम बादल गहराते हैं
बहते जाते हैं समय की हवा में
हर बूँद में विलोमात्मकता बरसाते हैं


"अपने" भूल जाते हैं
स्मृतियों की सार्थकता
मन-मौजी "सपने" का अल्हड़पन
कौन-सा पाठ पढ़ लेंगे उड़ते-पड़ते


"सपने" कभी गाँठ बाँध लेते हैं
अनभिज्ञ,सस्ती, विलोम-जिज्ञासा
कैसे तोड़ देती है "अपने" का भी अडिग संयम
५ रु. की "बेकार-खराब चाय" की फेरी


"अपने" ही तो बुनना शुरू करते हैं "सपनों" को
क्या मछलियों को चारा डालने के लिए
जाल बनाना सिखाते हैं??




मैं ग़ालिब तो नहीं...

मैं ग़ालिब तो नहीं...
मैं नहीं चाहता वाइज़ 
मुझे मरने के बाद जाने
तवज्जो न मिले मुझे बर्दाश्त नहीं
लिहाज़ा गरीबी लफ़्ज़ों की 
मेरे ज़ेहन पर गफ़लत रही

शायरी का इल्म नहीं 
सुबह रोज़ ही आ जाती है
शाम की बेशर्मी का भी ज़वाब नहीं
ये खुदी अक्सर खुदाई पर तोहमत रही


अंजाम की फिकर भी करेंगे
अभी दो-चार कदम चल दें
जाने कभी ख़तम हो सफ़र
अभी शुरुआत तो कर दें.

अंदाज़-ए-बयाँ अपना-अपना
पलकों पर हर ख्वाब का अलहदा रहना
पेपर की सारी cuttings , कबाड़ी को बेच दो
आज मिला है, फिर से कोई अपना


पूरी हो जाये गर शब्-ए-इंतज़ार कभी 
मैं यहीं पड़ा मिलूँगा, लाईनों की कब्र में
कभी फ़ुरसत में बदलो कीमती इल्म-ए-ज़हन के कपड़े
नींद-नरम तकिये की ओट लेकर मुझे ख्वाबों में ताकना


अपनी दुनिया तो खुद ही बनानी पड़ती है
सच्ची-झूठी, 
बाँट - बटखरे तो छांटने ही पड़ते हैं  
हालांकि तराजू तौलते हमेशा ही हाथ डगमगाते हैं

रोज़ के इनकार झेलकर
शब्-ए-ग़म-ए-फुरकत बाज़ भी नहीं आती है
आँखों का क्या है
ख्वाब भी यूँही बिना दस्तक चले आते हैं

वापसी गर मुमकिन होती बीते लम्हों की
ठहाके लगाती आब-ए-ग़म भी ज़मकर
इक बार जब रास्ता चल पड़े
रुक कर जहाँ भी देखो चौराहे मुस्कुराते हैं....