ना लाल, ना पीला, सबको बेरंग सलाम
मेहनतकशों की ख़ुशी का दिन है
मेरी बेमतलबी की बेबाक मेहनत, इक और कलाम
रूह तो कांपती ना होगी तेरी
अपने ही चेले चपाटों को देख कर
नाम तेरा, चर्चे तेरे
क्यूँ जीत जाते हैं ये खुदपरस्ती के गुलाम
कितनी हीं लाल रिसालें
खुद अपने हाथों जला डालीं
क्या करता अकेला था
और शख्सियतबाज़ी की दीमकें
खाए जा रहीं थीं मेरे कमसिन ज़ेहन को
ज़रा भी अंदाजा रहा होता तुझको
की लाल को मजलूम-खून का रंग समझ लेंगे
मेहनतकशों को तुने झंडा नहीं दिया होता
मेहनती औजारों को हथियार बना लेंगे
मजदूरों की प्यास पसीने से बुझेगी ना
मुआफ़ करियेगा सियासतबाज़ों
लेकिन अगर आप के पास
दुनिया को चलाने और बचाने की और तरद्दुदें बाकी हों
कुछ और लफ़्ज़ों को गले घोंट दीजिये, कहिये
"तुम मुझसे क्या बात करोगे, तुमने कहाँ दुनिया देखी है
जिस राह चलेगी और बचेगी दुनिया दौलतमंदों की नेकी है.."
और आखिर में मेरा जाती तजुर्बा
कुछ एक लाल-किताबों को अनजाने में पढ़कर:
मेहनत करने वाला अगर खिलाफत करेगा
निजाम हाथ में लेगा दुनियादारों की गनीमत करेगा
बड़े मीर कहते हैं अब
आजकल की दुनिया में कुछ भी गैर-मुमकिन नहीं
मैं देखता हूँ ख्वाब इक-इक मजदूर उठेगा कब्र से
सिर्फ हौसले भर से ही दौलत्बाज़ों की फजीहत करेगा..










