Sunday, 27 May 2012

भूख....प्यास.......कशमकश............


दो दिनों पहले अपने ऑफिस के चायवाले से हुई महज़ छोटी-सी बातचीत ने इतने विकट विचारों में उलझा दिया है.. बाबूजी 16 सालों से ये दूकान अकेला ही चला रहा हूँ, और तो कुछ कर नहीं पाया जिंदगी में लेकिन बच्चों को पढ़ा लिया, तीन लड़कों में से बड़ेवाले ने जबरदस्ती दकान पर आने की कोशिश भी की लेकिन मैंने उसको कहीं और नौकरी पर रखवा दिया. आठवीं तक पढ़ा है अगर हो सके तो उसको अपने ऑफिस में लगवा लीजिये, अच्छी चाय बनाकर पिलाएगा. पढाई पूरी करे ना करे आप सबसे काफी कुछ सीख लेगा-सुन, बोलकर आदमी तो बन ही जाएगा.. उसकी माँ दोहे सुनाते हुए बार-बार कहती थी, अगर बड़का अगर ठीक से पढ़-लिख लिया तो एक दिन बहुत नामी किताब लिखेगा. ऊ जो    राम बाबू लिखे रहें, ऊ से भी मोट....बेचारी चलिए गई बकते-बकते और उसकी पढाई भी खा गई.........  

कवितायेँ, उपन्यास, साहित्य, इतिहास, राजनीति......... भूखे पेट कोई किसी भी कला को सम्मान नहीं दे सकता... तो क्या शब्दों के सारे सिपाही भी अपनी-अपनी भूख से हारकर, ग़रीबों के दर्द बांटने के बजाए लालफिताशाहों और सियासतबाज़ों की तरह खूबसूरती की तारीफ़ और बुज़ुर्ग आलिम-ओ-फाज़िलों की अटकलों पर चलते रहेंगे?? कशमकश ने जबरन कुछ लिखवा दिया है .......

भूख  को
कविताएँ कतई पसंद नहीं होती
प्यास से
संगीत, अच्छे सिनेमा की बातें करोगे
ज़वाब में मिलेंगीं सूखी गालियाँ
मिहनत से
पूछकर देखना धीरज के बारे में
मुंह बनाकर आगे बह जाएगा पसीना
आदत से
ज़रा-सी नसीहत करके देखो ज़ब्त की
अक्ल और कुछ भी फेंककर मारने दौड़ पड़ेगा
क़िल्लत को
मंहगाई की वजहें समझाने पहुँचो
नैतिकता और बराबरी का उल्टा ब्रेनवाश हो जाएगा
ग़रीबी से
मत पूछना इन्द्रधनुष में खिले रंगों के नाम
शरमा जाओगे अपनी अकर्मण्यता और
अपने ही पुरखों की वहशियत याद करके

रगों में बहते तुम्हारे खून का रंग
अक्षरों के रंग में मिल जाएगा
वोही एक ही रंग
जो अमीर-ग़रीब में फरक नहीं करता
इंसानी रगों से बाहर आते ही
सारे रंग यूँ ही जम जाते हैं
शराफत की काली मिटटी में दबकर या
खुदपरस्त मजबूरियों की काली राख होकर.......................

Wednesday, 23 May 2012

बड़ी मुश्किल से

चलो आप कहते हैं तो नहीं सोचता 
उन सालों के बारे में 
जो लौटकर वापस नहीं आयेंगे..
मैं नहीं सोचूंगा उन ख्वाबों के बारे में 
जिन्हें देखने के लिए 
मैंने एक अदद आँख उधार ली थी
अपनी दूसरी आँख के साथ मिलाकर
जोड़ा बनाया था ना
नहीं सोचूंगा उन रातों के बारे में
जिनके धागों में मैंने यही ख्वाब पिरोये थे
मैं चाहता ही नहीं हूँ आजादी
बड़ी मुश्किल से
अपने आवारा हाथों को बाँधने के लिए
वक़्त की रस्सियों पर मैंने इतने बल दिए थे
इतने बल की मेरी खुद्दारी भी ऐंठ जाये
रगों में उठे और गले में बैठ जाए
मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है
ना तो इश्क के ज़ज्बे से
नाही रूमानियत से
मुश्किल बस एक ही है
ज़रा वक़्त देख कर इस सरूर को सर चढ़ना था
मैंने इलाज-ए-मजलूम आशिकी पा ली है
ज़रा अपने ज़ज्बातों की हैसियत
और अपने चेहरे की कैफियत सोचकर रुकना था
लगाम देना चाहिए था सरफरोशी को
लीक से कुछ अलग हट कर करने के जूनून को
सब कुछ ख़तम हो गया इस भरम की जरूरत
हर रोज़ नए अफ़साने लिखनेवालों को होगी
मैंने तो शुरू भी इसी से किया है
और ख़तम भी यहीं करूँगा.
नहीं, आप फिर गलत समझे
ये क़दावत नहीं, नाही शिकायत है
मेरे ज़हन के कुरआन छपी हुई
एक ही चुनिन्दा आयत है..
या तो मैं अहल-ए-खुदा की असलियत
सवाल रख दूँ फरिश्तों से,जो सुनें
या फिर आप जैसे पढने-सुनने वालों की गनीमत है..

Sunday, 20 May 2012

मुआवज़े...........


मुआवज़े चुकता नहीं होंगे
ताउम्र
हिसाब हमेशा चलता रहेगा..
यादों का
जो भी मुस्कुराहटें
वजूदों ने खरीदीं-बेचीं
लम्हों-ज़र्रों की कलम से दर्ज रहेंगीं

रंग-बरंगे
glitter पेन से लिखे कार्ड
और हंसता हुआ-सा बौड़म खरगोश
अहम्कानी फितूरों की वो रातें
बालकनी में छुपी चाँद से मुलाकातें

संभाल कर रखता चला हूँ
अपने wallet की छिपी हुई जेब में
कोई तस्वीर...
या लड़कपने की खुश्बुनुमाँ चिट्ठियों की तरह..

तुम कहो तो सही..
ज़ज्बातों को परे ही रख दूँ लिखते हुए
ज़रा सोचना गर
तुम्हें पढ़ते हुए ख़याल आ जाए

ज़न्नत को ज़मीन पर उतार लेना
चंद लफ्ज़
आवारा तसव्वुर से उधार लेना
खुश रहना
क्यूंकि मायूसी
हारनेवालों की महबूबा है

आज फिर निकला है आफ़ताब
जलने की आफ़त सर लिए
कल ना जाने थककर
किस छोर पर डूबा है........

क्या डर है उन्हें,


उम्मीद के दीयों की बीनाई
कब्जाने के फ़िराक में
खालिस जलने का ज़ज्बा सिखाते
बड़े-बुज़ुर्ग, आलिम-ओ-फ़ाज़िल
क्यं भूल जाते हैं
चिरागों के तले ही तीरगी छुप जाती है...

क्यूँ नहीं सुलगने देते हैं हर बाती को
बिला खुदपरस्ती के तेल भर कर
क्या डर  है उन्हें,
की कंक्रीटों के बसाए उनके जंगल
जला डालेंगीं कमसिन बेबाक चिंगारियां...

यक़ीनन उन्हें गौर करना चाहिए था
की बेचने के लिए जो भी कुछ बोया था
खाद की तरह इस्तेमाल की गईं
मजलूम ख़्वाबों की लाशें
रूह बनकर लफ़्ज़ों की
ऐसी आंधी-तूफ़ान बनकर आएंगीं
हवा देकर जलाती जाएंगी
इक नई शाख को
हर बार अपने बुझने से पहले....

खौफ़ भी नहीं खाते हैं क्यूँ
मजलूमों के दर्द-ओ-ग़म बेचते हुए
भूख से मारों को दूर से रोटी दिखाते हुए
जिस किसी भी दिन बगल में
सड़ते हुए अनाजों की बदबू में
छुपकर बैठे हुए मोटे आदमखोर चूहों पर
गंध घुस गयी अगर
नए 'मुसहरों' की नाक में
याद दिला देंगे अपनी जात की असलियत...

झुठला देना भर या भूलकर
अपनी, हाँ अपनी-ही बीवियों-बच्चों को
सूखे होठों और सूनी कलाईयों को
शिकार करके मोटे-पतले चूहों को
मिला देगा सारे गोदामों में
सल्फास की गोलियां चूरकर
बचा लेगा वो अपनी जात
और मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने वाले
सारे शाकाहारी तक मारे जाएंगे
.........



वक़्त बदल रहा है.....

वक़्त बदल रहा है
बुजुर्गों की हिदायतें बदलनी चाहिए.
सही-गलत दलीलें, तमाम किताबें भरीं हैं
वक़्त बदल रहा है
दुनियादारों की कवायदें बदलनी चाहिए

किसके पुरखों ने कौन-से गुनाह किये है
किसने मंदिर-ओ-मस्जिद सब तबाह किये है
वक़्त बदल रहा है,
माज़ी-ज़हनों ज़बरन भरीं, तिजारतें बदलनी चाहिए

वो बाँट देते हैं और हम बँट जाते हैं
अपने-अपने हिस्से, तारीफें छांट लेते हैं
वक़्त बदल रहा है
लफ्ज़-शराफतों की शिकायतें बदलनी चाहिए
 
पूँजी-दाराना सियाह रातें
ग़ुलाम-ए-खमीरी चिरागों रौशन ना होगी
वक़्त बदल रहा है
ख़ाक-चिंगारियों की खिलाफतें बदलनी चाहिए

अबके ज़वान हो कलम से
कुछ हकीक़त की गफ़लत करो
बजाये ख़िलअत-ए-इश्क सजाने
असलियत के नंगे जख्मों, ज़माने के नेमत करो
वक़्त आ गया है शायरों!!
इल्म-ए-शायरी रिवायतें बदलनी चाहिए..

Friday, 4 May 2012

"एक टुकड़ा बचपन.............."

सुबह सुबह राजू मम्मी के आँचल में सुबक रहा था. वही रोज़ की कहानी- मम्मी आज फिर मैं दीदी की वजह से लेट हो जाऊँगा, मुझे फिर पीछे बैठना पड़ेगा.. मम्मी अपनी अस्त व्यस्तता झिड़क कर निकालती है- राजू तुम्हारा सुबह सुबह पिटने का मन तो नहीं हैं ना? सहम कर राजू पापा की तरफ रुख करता है- पापा और उनके तीन दोस्त किसी क्रांति की बात कर रहे थे.. सबकुछ ठीक रहा तो आज बिना मार स्कूल से बच सकता हूँ, सोचते-सोचते राजू जाकर खड़ा हो गया मिहिर अंकल के और पापा के बीच में. बिना चाहे भी उनकी बातें कानों में पड़ती रहती रही- कामरेड होना और बात है लेकिन होलटाईमर बनने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए... क्या बेफजूल की बातें हैं एक पोपिंस तो लाया जाता नहीं इनसे और मम्मी कहती हैं- बहुत बड़े-अच्छे आदमी हैं मिहिर अंकल, पापा भी उनको बहुत  मानते थे.. पापा ने आवाज़ दी- तुमलोग स्कूल के लिए लेट हो जाओगे ज़ल्दी निकलो और फिर दीदी के हाथ में दो रूपए का सिक्का पकड़ा दिया. पापा भी ना दो एक रूपए के सिक्के नहीं दे सकते थे क्या?? हुंह..


पूरे रास्ते राजू सोचता हुआ जा रहा था- आज वो दस पैसे वाला पाचक एक ही लूँगा, जेम्बो लेना ही पड़ेगा ज्यादा दाने होते हैं ना उसमें दो-दिन चलेगा. अरे लेकिन पैसे तो दीदी के पास हैं!! अभी वो अपना ज्ञान  झाड़ेगी- पाचक में गंदगी वाला नमक होता है, जेम्बो खाने से दांत सड़ जाते हैं और पता नहीं क्या क्या?? दीदी अपने दोस्तों की भी नाकों में दम कर देती होगी ना?? मज़े-मज़े में स्कूल आ गया और राजू अपनी कक्षा में जाकर बैठ गया.. मगन था सारे होमवर्क करके आया था, एक-एक लेस्संस याद करके.. राजू को स्कूल बहुत पसंद था, सारी मिसेज भीं.. अनीता मिस को देखकर तो वो हमेशा सोचता था- काश मैं अनीता मिस का बेटा होता.. कितनी अच्छी थीं अनिता मिस.. कितनी सुन्दर-सुन्दर साड़ियाँ थीं उनके पास  और वो मम्मी और बाकी  मिस  लोगों की तरह आधी बाजू की ब्लाउज  भी नहीं पहनतीं हैं. अपनी पेंसिल को बराबर छीलता हुआ बीच-बीच  में निकाल कर देखता है- बापरे! आधी रह गयी है!! अभी कल  ही मम्मी ने दी थी.. लेकिन  मम्मी को ये क्यूँ समझ में नहीं आता की अच्छी लिखावट के लिए पेंसिल  की नोक  सही रखनी पड़ती है.. अनीता मिस  क्लास  में आने से पहले साड़ी क्यूँ संभालती हैं हर बार?? अरे मिस आ गईं.. गुड मोर्निंग मिस!! राजू रोज़  जान बूझकर बाकी बच्चों से पीछे ये बात बोलता है लेकिन  मिस  रोज़  उसके ख़तम  करने से पहले गुड मोर्निंग  बच्चों कह कर  बैठ जाती हैं..   


छुट्टी की घंटी एकदम से हड़बड़ा देती है राजू को- पैसे तो दीदी के पास  हैं?? तो क्या हुआ?  लौटकर मम्मी के पास  तो जाएंगी ही.. और मम्मी के न्याय  राजू को पूरा भरोसा था.. टॉफी के बराबर टुकड़े करती हुई मम्मी उसको 'अदालत' फिल्म की वो सफ़ेद वाली मूर्ती दिखती थी तराजू के बदले अपना सुपाड़ी काटने वाला सरौता हाथ  में लेकर मम्मी बिलकुल  सटीक, बराबर हिस्से करती है हर chocolate के.. दीदी का हिस्सा ज्यादा बड़ा है कहकर पैर पटकने में कोई भलाई नहीं है राजू को मालूम  था. ऐसा करने से पूरी  टॉफी मम्मी के हिस्से में चली जाएगी और फिर उसको दीदी के गुस्से का भी डर था..

घर आ गया था.. राजू की नज़र  बरामदे में खड़े छोटे मामा जी पर क्वार्टर कम्पाउंड में घुसते ही पड़ गयी थी. लेकिन  दीदी ने तो बताया था की नानी माँ भी आएंगीं, उल्लास  में छोटे कदम  भाग  पड़े.. आँगन  में पहुँचते ही ठिठक कर रुक गया. ट्रंक  बाहर बरामदे में क्यूँ रखा है? बैग, VIP  सब पैक होकर बाहर रखे हैं!! मिहिर अंकल  कुर्सी पर चाय  पीते हुए मुस्कुरा रहे हैं.. मम्मी की आवाज़  थप्पड़ से भी ज्यादा तेज़ थी- राजू जाकर कपडे बदल लो.. ऐसा लगता है मुम्मी बहुत  रोईं हैं, उस दिन जब कल्पना को punishment मिली थी तो उसके भी बाल बिखर गए थे.. लेकिन  मम्मी को punishment कौन  देगा?? पापा कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं?? दीदी  चुपचाप कपड़े बदल कर मम्मी की बगल में आकर कड़ी हो गयी थीं. राजू के इशारे पर  मम्मी की तरफ देखते हुए उसका  का हाथ  पकड़ कर पापा के कमरे में ले गयी. दोनों रैकों के बीच  खड़े होकर दीदी बिलकुल  मम्मी की आँख  में आँखें डाल कर राजू को समझा रही थी- मम्मी का मूड ठीक  नहीं है, तुम  फिर से अपने सवालों के खेल  में मत  लग  जाना. आज रात को हम लोग  पटना जा रहे हैं, जाने से पहले फिर मार पड़ जाएगी , पिछली बार की तरह सूजा हुआ  मुंह लेकर जाना वहाँ घूमने. अब राजू से रहा नहीं गया- हम लोग  घूमने जा  रहे हैं? दीदी की आँखों में अब और देखने की हिम्मत  नहीं हुई उसकी..

कैपिटल  एक्सप्रेस  प्लेटफार्म  नंबर एक  पर आएगी. लेकिन  मामाजी, मिहिर अंकल  से  बात  कर रहे थे  दानापुर एक्सप्रेस  में इतना भीड़ होता है- दो ही टिकट कन्फर्म  हो पाया है. मिहिर अंकल  फिर मुस्कुरा रहे थे- कोइ बात  नहीं टीटी से  बात कर लेंगे.. दीदी हमलोग तो प्लेटफार्म  नंबर एक पर खड़े हैं?? यहाँ पर तो कैपिटल  एक्सप्रेस  आनेवाली है? दीदी खा जाने वाली आवाज  में बोली- राजू!! दानापुर और कैपिटल  दोनों एक  ही ट्रेन है.. लेकिन  एक  ट्रेन  के दो नाम  क्यूँ? इस बार राजू मन ही मन  बोला था.. प्लेटफार्म  पर ब्रीफकेस  पर बैठना  राजू को बड़ा पसंद था. इतना मज़ा उसको ट्रेन में  खिड़की वाली सीट पर बैठने में भी नहीं आता था.. मिहिर अंकल  ने फिर से उसको चिढ़ा  दिया- राजू ट्रेन  आने वाली है, तुम  थर्मस  तो  उठा ही सकते हो .. मामा जी  कुलियों से बात कर रहे थे थे- पचास  रूपये  देंगे -  ट्रंक, बेडिंग  और ब्रीफकेस  चढ़ा दो 71, 72 सीट है, गेट के पास  ही है. बूढ़े कुली ने बेकार बेकार कोशिश  की- भैया, 60 रूपा लगतौ. मामाजी सधे  थे 50!! 
ट्रेन  में सब  सामान  चढ़ गया लेकिन  मम्मी का गुस्सा अभी भी चरम  पर था.. राजू ट्रंक  ठीक  बीच  बैठकर कधों को झुकाकर  खिड़की से बाहर की तरफ  देखे जा रहा था. मम्मी मिहिर अंकल  के साथ नीचे उतरीं तो राजू से रहा नहीं गया- दीदी, इतना  सारा सामान लेकर घूमने क्यूँ जा रहे हैं ? पापा नहीं जा रहे हैं हम लोगों के साथ?  वो कोमिक्स लाने गए हैं ना? मिहिर अंकल भी हमलोगों के साथ  जाएंगे?? क्यूँ , मामाजी  तो  जा ही रहे हैं?? राजू का  दायाँ कान  कुछ  मिनटों के लिए सुन्न हो गया !!! मम्मी अन्दर आ चुकीं थीं, मामाजी  नहीं होते तो शायद दूसरा कान  भी सुन्न हो चुका  होता. मम्मी  को कांपते देखकर ट्रेन  चल  पड़ी. मामाजी  के दोनों हाथों में छुपते  हुए राजू को प्लेटफार्म  पर पापा  दिख  गए, राजू  खिड़की की तरफ  लपका तो पापा ने  मामाजी  को थैला पकड़ा दिया . राजू ने  झपट कर जैसे ही उसे पलटा- चाचा -चौधरी के दो कोमिक्स और तीन  पोपिंस  के पैकेट  गिर पड़े बर्थ पर.. मम्मी का हाथ  राजू से ज्यादा तेज़  था, उन्होंने  सब वापस उसी थैले में  समेट  कर फ़ौरन  बाहर फेंक दिया .. लेकिन तीन  में से पोपिंस  का एक  रोल,  मम्मी की नज़रों से बचकर गेट की तरफ  लुढ़क  रहा था.. लेकिन  मिहिर अंकल  की नज़रों और उनकी मज़बूत  पकड़ से बचना राजू के लिए नामुमकिन  था. और लुढ़कता हुआ  पोपिंस  गेट से बाहर  गिर गया. मम्मी  की दो एक  चूड़ियाँ राजू को पीटने में हमेशा शहीद  हो जाती थीं.. इस बार कुछ  ज्यादा ही मारकाट हुई.. मम्मी  का हाथ भी कट  गया था शायद? राजू  की हिस्कियां गले में सुबक  रहीं थी, मामा जी और दीदी एक-दूसरे  की ओर नहीं  देख  रहे थे.. मिहिर अंकल ने जब तक  मम्मी की कलाईयों पर dettol लगाया, उनका मूड थोड़ा  ठीक हो चला  था. अपना  पर्स  खोलकर मम्मी ने एक  किस मी बार  निकाल कर राजू को दिया - बिलकुल  लड़कियों की तरह रोते हो तुम  राजू.. राजू ने चुपचाप  सर  हिलाकर टॉफी लेली.
पहले टुकड़े ने ही राजू का मन  फेर दिया. उसे इलायची की खुशबू पसंद नहीं थी, उसे तो चटपटे रंग - बिरंगे  पोपिंस  पसंद थे. और मम्मी को भी तो पसंद थे?? नींद और सवालों ने फिर से राजू के पेट में  गड़बड  मचा दी है.. दीदी ठीक ही कहती थी पाचक  में गन्दगी वाला नमक  होता है. लेकिन  पापा हमारे साथ  क्यूँ नहीं  आये? वो प्लेटफार्म  भी छुपे हुए थे? उनकीं आँखें भी लाल थीं? क्या उनको भी punishment मिली थी? लेकिन  मम्मी, पापा दोनों को punishment कौन  देगा? ट्रेन  तेज़  हो गयी थी और सवाल  लोरी  गा रहे थे.....................ऐसी लोरी जो मम्मी ने पहले कभी नहीं गाई थी.........................        


             

आवारगी के फलसफे......


कितने चैन-ओ-सुकून तलब हैं
आवारगी के फलसफे......

साथ चल दिया तो जान-ए-ज़िगर
हमसफ़र,
ना साथ चला
नूर-ए-नज़र कोई और था.

साथ रह गयी तो आदत
इबादत,
ना साथ रही
मुहब्बत कोई शौक था.

सजा कर गयी तो आहट
मुस्कुराहट,
ना सजा सकी
कंपकंपाहट, कोई खौफ़ था

सीख कर गयी तो शायरी
दुनियादारी,
ना सीख सकी
रियाकारी, कोई बेलौस था

'आलिम' की गवाही 'फ़ाज़िल' देगा?
कुरआन-ए-इश्क
लिक्खी आखिरी आयत
जिंदगी नहीं कोई मौत था...

Thursday, 3 May 2012

शायरी


खानसामा नहीं है शायरी
दौलतमंदों की बिगड़ी औलादें
नुमायाँ गरीबों की भूख को
ज़ज्बों को परोसकर हरूफों में
पेट भर कर तारीफों के
दिल्लगी, वाह-वाह और शुक्रिया अदायगी

नक़ाब नहीं है शायरी
संगीन इंसानी इरादों के रुखसार ढकने
रेशमी लफ़्ज़ों का काला बुरखा
सिर्फ गर्दन के ऊपर-ऊपर रखना
पढने, लिखने, सुनने के तमाम ज़रिये बसर
आवाज़ ज़मीर तक पहुँचने की नौबत नहीं आएगी


कलम-ए-खुद्दार मुमकिन है शायरी
आवाज़ बेनज़ीर ज़मीरों पहुंचाएगी
नसें भरीं होंगीं इंसानी लहू की सियाही
हूक उठेगी कमसिनों की लरजकर
दुनियादारों के तख़्त-ए-ताउस गिराएगी....

दस दिन।..

प्रेम की वास्तविकता के अगले दस दिन

१)

सुबह शुरू होगी उलाहने से
इतनी देर तक क्यूँ टिकी रही शबनम
पंखुड़ियों की तह तक
पहुंचेगी गुस्सैल दुपहरी
गर्मी इतनी बढ़ेगी  मई महीने की
पेशानी से सारी बूँदें,पसीने सुखा देगी

ना चाहकर भी दिन को चढ़ना होगा
भूख-प्यास के तराजू टांग
फेरी लगानी है तंग बेईमान गलियों में

शाम तक कुछ बाकी-बिक्री
सिला बारहा बिकते रहने का
बचा खुचा वजूद समेत कर
शब्-ए-फुरक़त फिर मुस्तकबिल ख्वाब
ज़मींदोज़ इशारे उम्मीद-ए-सहर
फिर से लौटकर आनेवाले हैं

कहाँ छुपकर बैठी रहेगी पूरे चौबीसों घंटे
ज़ज्बा-ए-पाक़ सुस्ताती रहेगी
अगले दस दिनों तक
गुमनाम आशिकों के मजारों
दलीलें लिखती-पढ़ती रहेगी
हरूफों से शिकायत करने का जी करेगा
और जिंदा गफलतों में गुम होकर जियेगी..

Wednesday, 2 May 2012

बस अभी-अभी

बस अभी-अभी
हसीं याद-ए-चिलमन, परदे सरके हैं 
लफ्ज़ निकले जिंदा तारीफों के
लाजिम नियत-ए-ज़वाब 
शर्मिंदगी के गले अटके हैं 

इसानियत की कदरें लेकर
तलाशना अमन फरिश्तों को
बस अभी-अभी 
मुर्दानशीं, भिखमंगे ख्वाब,
हकीकत की आँखों चटके हैं 

बेइंतेहा नामुमकिन है 
हर खूबसूरत अशआर को ग़ज़ल बना लेना
बस अभी-अभी 
हसरत-ए-आवारा मुसाफिर,
ज़ज्बा-ए-पाक़ राहें भटके हैं 

बला की शोखी, कमसिन 
ख़मीर-ओ-मुफलिस उनींदी शाखें 
बस अभी-अभी
दो-चार अजनबी शरारती इशारे 
वक़्त की उम्मीदों पर लचके हैं

मौकापरस्ती से मिलकर
खुदगरजी क्या अजीब रंग लाई है
बस अभी-अभी
मुसव्विर जिंदगी के ब्रुश गले लग कर 
लम्हों के केनवास मटके हैं..


कदरें= उसूल; ख़मीर-ओ-मुफलिस= materialistic inheritance