Friday, 8 March 2013

आज

मेरी डायरी में 
उतने ही बार मैंने शब्द लिखे 
जितनी बार मैं तुमसे सच कहना चाहता था 
ना तुमने कभी गिनती की 
और ना ही मैंने कविताएँ लिखीं 

बस, कुछ शब्द 
जमा करता रहा असफलताओं के खाते में 
ताकी खर्च कर सकूँ व्यस्तता 

ये सब जमाखोरी कल के लिए ही तो थी 
कल, जब तुम गिन पाओगी अपनी उलझी हुई लटों को 

लेकिन उस आनेवाले कल के लिए 
आज का बीत जाना जरूरी था 

आज ने मांग लिए हैं मेरे शब्द उधार 
और मैं मना नहीं कर पाया 
क्यूंकि मैं आज से प्रेम करता था

No comments:

Post a Comment