मेरी डायरी में
उतने ही बार मैंने शब्द लिखे
जितनी बार मैं तुमसे सच कहना चाहता था
ना तुमने कभी गिनती की
और ना ही मैंने कविताएँ लिखीं
बस, कुछ शब्द
जमा करता रहा असफलताओं के खाते में
ताकी खर्च कर सकूँ व्यस्तता
ये सब जमाखोरी कल के लिए ही तो थी
कल, जब तुम गिन पाओगी अपनी उलझी हुई लटों को
लेकिन उस आनेवाले कल के लिए
आज का बीत जाना जरूरी था
आज ने मांग लिए हैं मेरे शब्द उधार
और मैं मना नहीं कर पाया
क्यूंकि मैं आज से प्रेम करता था
No comments:
Post a Comment