Friday, 7 September 2012

बोरिंग-कहानी-1



क्या मालूम हो गया तुम्हें
मैंने फिर से, अपना मोबाइल खो दिया है
कोइ नई बात नहीं है ना 
मैंने फिर से, एक नया सिम लिया है 
अब नया हेंडसेट खरीदने के लिए 
जेब में पैसे नहीं हैं 
दो मिनट के लिए कोइ उधार भी नहीं देता 
मेरे दोस्त, तुम्हारे जैसे नहीं हैं 
खैर, साइबर कैफे जाकर 
facebook से तुम्हारा नंबर लिया 
पुरानी ATM स्लिप के पीछे लिखकर 
वापस wallet में संभाल दिया 
पूरे रास्ते मैं ढूंढता रहा 
बड़ी मुश्किल से वो पुराना बोर्ड दिखा 
इन्टरनेट, फैक्स, फोटो-स्टेट के नीचे 
एक कोने में था PCO लिखा 
पहले से ही निकाल कर वो पर्ची 
जल्दी से उस दुकान में घुसा 
टेलीफोन की बाबत पूछने पर 
system पर गेम खेलता अधेड़ बड़ी जोर हंसा
मोबाइल के ज़माने में ढूँढ़ते हैं पब्लिक बूथ 
देश-दुनिया तो गर्त में ही जाएगी 
अब भी कितना पीछे है हमारा यूथ 
हंसी के रुकने या शायद गेम-ओवर होने से  
उनको मेरी बेचैनी का एहसास हुआ 
अरे! कोई बहुत ज़रूरी बात है तो 
मेरे फोन से ही ट्राई करो ना, बुआ!!
कुछ और सोचे बिना ही मैंने 
उनके हाथ को लपक लिया 
चश्मे के नीचे कुछ रुका हुआ था 
चुपके स्क्रीन पर टपक लिया 
पोंछ कर सीने से, पर्ची खोलकर  
मैं तुम्हारा नंबर डायल करने लगा
इससे पहले की कॉल कनेक्ट होती 
कोई इनकमिंग का सिग्नल लगने लगा 
'हमरा हऊ चाही' की tune में 
हमारी लोकल संस्कृति बजने लगी 
हथेली खोल दी मैंने 
'मुन्नी' उँगलियों ही लिपटने लगी 
अंकलजी टोन सुनते ही 
काउंटर छोड़ कर झपटे 
तुम अपना जरूरी कॉल बाद में कर लेना 
पहले हम अपनी 'शीला' से निपटें 
ऑन करते ही उनकी आवाज
गरम शीशे सी पिघल गयी 
मैंने अभी तक मेहंदी नहीं लगाई 
सावन की आखिरी तारीख भी निकल गयी 
इतने में वो दबंग अपनी privacy बचाते हुए 
बाहर गली में निकल लिए 
फोन फंसा लिया कंधे और गर्दन के बीच 
पड़ोस की दीवार पर शंका निवृत हो लिए 
वापस लौट कर आते ही 
वोही आवाज़, वही दम था 
जल्दी अपनी बात ख़तम करो 
हमारे पास वक़्त ज़रा कम था 
इस बीच मैंने वो नंबर इतनी बार पढ़ा 
की शुरू से आखिर सब याद हो गया 
कई बेल्स के बाद भी रिस्पोंस नहीं आया 
सारा talk-time भी बर्बाद हो गया 
अब, ध्यान गया 
तुम तो अपने क्लास में होगी 
मैं तो यूँही आम बातें करता रहा हूँ 
तुम्हारी दिलचस्पी तो किसी ख़ास में होगी 
चलो इतना वक़्त बर्बाद कर ही दिया 
तो ये भी बता दूँ 
मैं कोई गली, रास्ते, मकान भूलता ही नहीं हूँ 
अब तुम ही कहो मैं अपना कौन-सा पता दूँ।।।।।
      

Thursday, 21 June 2012

उबलना क्यूँ जरूरी होता है??


उबलना क्यूँ जरूरी होता है
आराम से सोचते हुए लिखना
ख्वाब, ख्वाब ही रहते हैं कई

कविता सिर्फ पढने के लिए होती है क्या
कुछ सुनाने के के लिए क्या लिखना चाहिए

अक्षर सिर्फ शब्द बनकर रह जाते हैं
उम्मीद के रास्ते घेरकर
परछाइयां हमेशा छुपकर नहीं बैठती

वनस्पति ज्ञान पढ़कर
फलों की विविधताओं को बेचना
इतना मुश्किल होता है
और मैंने सुना था
कुंदन जल कर लाल होता है!!

किसके 'यलगार' बोलने से
जंग शुरू हो जाएगी
ढूंढते हुए उस 'सेनापति' को
कैसे परखेंगे छद्मवेशियों को
क्या सिपाही फिर से उतने ही मारे जाएंगे??

बदलाव की सोचते ही
जिम्मेदारियों, चुनौतियों से घबराहट होती है
यायावरी, पीठ मोड़ते हुए
किसी और ही शक्ल में आती है..

छुपने की कोशिश शायद जीतने की हो
वक़्त बीतेगा तो हिम्मतें परखीं ही जाएंगी...
 

विकास....

कोयल की चाची ने उससे कहा था 
वो किसी कोव्वे की बेटी थी 
पूरी जिंदगी ना नहाने की कसम खा ली 
सुरीला गाती रही.....
लेकिन रंगत उसकी काली की काली रही 

सिर्फ एक ही मौसम में गाने की आज़ादी 
उसने अपने अंडे भी 
कौव्वों के घोंसलों में रखने शुरू कर दिए 

साल गुजरते रहे 
नए परिंदे उड़ना-गाना सीखते रहे 
और 
अपने पूर्वजों के बताए रास्ते पर चलते रहे 

कौव्वों को 
चालबाजियों का पता चला 
जम कर क़त्ल-ए-आम हुए..

थोड़े-थोड़े ही बचे 
कोयल और कौव्वों में अब भी बहस जारी है..
क्या जरूरी नहीं 
प्रगति को रोक कर 
कुछ पुरानी नीवों की मरम्मत की जाए??

Saturday, 16 June 2012

अर्ध विक्षिप्त सत्य..........

रेंगती हकीकत ...
बूँद बूँद रिसती टीस ...सवाल ख़याल ...
टीसते फांसे
अर्ध विक्षिप्त सत्य..........


शरीर की सारी त्वचा 
एक पारदर्शी-सा खोल मात्र रह गयी है … !

व्यक्तित्व को स-प्रयास ठूंस दिया गया है 
चरित्र को द्रव बना लेने से और भी आसानी रही .. !

निडरता मृत्यु के चिंतन से मिली नहीं .. 
सत्य और असमर्थता की विभीषिका ने 
डर को ही डरा कर निडर कर दिया है !

शल्क की यथार्थपरकता का उद्देश्य 
टूट जाने के बाद भी टुकड़ों को समेटे रखना है ! 
कवि-लेखक भी अपनी सबसे प्रबल उद्वेलना, 
पीठ के पीछे दिनचर्या का सारा गणित लिखते हैं !

विचारों तक क्रांतिकारी ग्राह्य हैं .. 
वास्तविकता शब्दों और छंदों से परे है ..
रचनात्मकता भी अर्थ और उपलब्धता के सामर्थ्य पर निर्भर !

जो भाषा हममें से किसी की भी मातृभाषा नहीं है 
समेकिकता के नाम पर राष्ट्रभाषा बना सकते हैं 
बलात कोई भाषा, जन-भाषा तो नहीं बनाई जा सकती … !

लेखकों-समीक्षकों को प्रभावित करने की सीमाएं पारकर 
पाठकों के लिए लिखे जाने पर अश्लीलता का आरोप-मंडन .. !

सारे ज्ञानी मित्र सलीलता की पांडवों के तरह रक्षा करते हैं 
और खपने देते हैं समाज को द्रौपदी की मर्यादा सदृश 
सत्ता-समर्थ दुश्शासन का अट्टहास 
किसी भीम को प्रण नहीं देता 
बाकी चारों भी हाथ जोड़े 
नैतिकता के हरि-नाम की शरण में पूर्ववत रहते हैं...

कई दिनों से......

कई दिनों से आईना मुझे पहचानता नहीं 
कई दिनों से कोई दोस्त मुझसे मिला नहीं 
कई दिनों से फ़क़त उम्मीदों के कांटे सूखते रहे 
कई दिनों से फूल हिम्मत का शाखों पर खिला नहीं 

कई दिनों से हरुफें रूठीं रहीं हैं अशआरों से
कई दिनों से एक उम्दा शे'र भी सुना नहीं
कई दिनों से तसव्वुर, माज़ी संदूक-ताले में बंद है
कई दिनों से इल्म-ए-शायरी, करामात किया नहीं

कई दिनों से डायरी में कुछ लिखा नहीं
कई दिनों से चाँद भी खिड़की में दिखा नहीं
कई दिनों से रात ने कपड़े नहीं बदले
कई दिनों से दिन भी दफ्तर में टिका नहीं

कई दिनों से हवाएं लिपटती नहीं सज़र से
कई दिनों से क़तरा-ए-अश्क पत्ता धुला नहीं
कई दिनों से आवारा नज़रों में खूबसूरती कैद रही
कई दिनों से वाइज़ की नाउम्मीदी का गिला नहीं...................

तुम्हारी खामोशी.........


तुम्हारी खामोशी दिल में बैठ जाती है
रोज सुनता हूँ लेकिन
चिड़ियों का चहचहाना याद नहीं रहता

वक़्त अपने पहियों के निशान
सूखी सड़क पर छोड़ता है
अगरचे इधर निकलने से पहले
किसी गीली गली से गुजरा हो

यादें धुल कर निकल जानेवाली मैल नहीं
बारहा सफाई की ज़द्दोज़हद
कहीं से आकर फिर जम जाती है
कुफ़्र कोई दिल-ओ-दिमाग पर

उम्मीदें आदतन परछाइयों-सी बन
दो पहर बाद लम्बी होकर
तेज़ कदमों से भी आगे ही चलती

अन्धेरा आवाजें देकर थक जाता
सारी अमावस अकेले चलने की कसम खा ले
अपना भी अक्स देखने के लिए
रौशनी की दरकार बनी रहेगी....

खूबसूरती।..

इक तस्वीर खुली सामने
मुसव्विर खद खुदा रहा होगा 
झूमती लटों के सहारे, आज 
यहीं, ज़न्नत ज़मीं पर उतर रही

संभलते हैं ज़ज्बात 
अनछुए नाज़ुक हाथों को थाम 
ख्वाहिशों का क्या है, फासला 
दूर, दरया-ए-अश्क़ पर सिफ़र रही 

बहुत हल्की-सी मुस्कुराहट
जैसे कोई कमसिन शरारत
तारीफ़ भूल गयी सब, इशारे
सूफी, खूबसूरती चेहरे पर बेउमर रही

गुम गईं हसरतें हासिल की
सर्द हवा से बयाँ कोई हुस्न
फलक भी छोटा रहा, चितवन
आड़े, बेजा हालात लम्हों पर खुशतर रही..........