Saturday, 16 June 2012

अर्ध विक्षिप्त सत्य..........

रेंगती हकीकत ...
बूँद बूँद रिसती टीस ...सवाल ख़याल ...
टीसते फांसे
अर्ध विक्षिप्त सत्य..........


शरीर की सारी त्वचा 
एक पारदर्शी-सा खोल मात्र रह गयी है … !

व्यक्तित्व को स-प्रयास ठूंस दिया गया है 
चरित्र को द्रव बना लेने से और भी आसानी रही .. !

निडरता मृत्यु के चिंतन से मिली नहीं .. 
सत्य और असमर्थता की विभीषिका ने 
डर को ही डरा कर निडर कर दिया है !

शल्क की यथार्थपरकता का उद्देश्य 
टूट जाने के बाद भी टुकड़ों को समेटे रखना है ! 
कवि-लेखक भी अपनी सबसे प्रबल उद्वेलना, 
पीठ के पीछे दिनचर्या का सारा गणित लिखते हैं !

विचारों तक क्रांतिकारी ग्राह्य हैं .. 
वास्तविकता शब्दों और छंदों से परे है ..
रचनात्मकता भी अर्थ और उपलब्धता के सामर्थ्य पर निर्भर !

जो भाषा हममें से किसी की भी मातृभाषा नहीं है 
समेकिकता के नाम पर राष्ट्रभाषा बना सकते हैं 
बलात कोई भाषा, जन-भाषा तो नहीं बनाई जा सकती … !

लेखकों-समीक्षकों को प्रभावित करने की सीमाएं पारकर 
पाठकों के लिए लिखे जाने पर अश्लीलता का आरोप-मंडन .. !

सारे ज्ञानी मित्र सलीलता की पांडवों के तरह रक्षा करते हैं 
और खपने देते हैं समाज को द्रौपदी की मर्यादा सदृश 
सत्ता-समर्थ दुश्शासन का अट्टहास 
किसी भीम को प्रण नहीं देता 
बाकी चारों भी हाथ जोड़े 
नैतिकता के हरि-नाम की शरण में पूर्ववत रहते हैं...

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