रेंगती हकीकत ...
बूँद बूँद रिसती टीस ...सवाल ख़याल ...
टीसते फांसे
अर्ध विक्षिप्त सत्य..........
शरीर की सारी त्वचा
एक पारदर्शी-सा खोल मात्र रह गयी है … !
व्यक्तित्व को स-प्रयास ठूंस दिया गया है
चरित्र को द्रव बना लेने से और भी आसानी रही .. !
निडरता मृत्यु के चिंतन से मिली नहीं ..
सत्य और असमर्थता की विभीषिका ने
डर को ही डरा कर निडर कर दिया है !
शल्क की यथार्थपरकता का उद्देश्य
टूट जाने के बाद भी टुकड़ों को समेटे रखना है !
कवि-लेखक भी अपनी सबसे प्रबल उद्वेलना,
पीठ के पीछे दिनचर्या का सारा गणित लिखते हैं !
विचारों तक क्रांतिकारी ग्राह्य हैं ..
वास्तविकता शब्दों और छंदों से परे है ..
रचनात्मकता भी अर्थ और उपलब्धता के सामर्थ्य पर निर्भर !
जो भाषा हममें से किसी की भी मातृभाषा नहीं है
समेकिकता के नाम पर राष्ट्रभाषा बना सकते हैं
बलात कोई भाषा, जन-भाषा तो नहीं बनाई जा सकती … !
लेखकों-समीक्षकों को प्रभावित करने की सीमाएं पारकर
पाठकों के लिए लिखे जाने पर अश्लीलता का आरोप-मंडन .. !
सारे ज्ञानी मित्र सलीलता की पांडवों के तरह रक्षा करते हैं
और खपने देते हैं समाज को द्रौपदी की मर्यादा सदृश
सत्ता-समर्थ दुश्शासन का अट्टहास
किसी भीम को प्रण नहीं देता
बाकी चारों भी हाथ जोड़े
नैतिकता के हरि-नाम की शरण में पूर्ववत रहते हैं...
बूँद बूँद रिसती टीस ...सवाल ख़याल ...
टीसते फांसे
अर्ध विक्षिप्त सत्य..........
शरीर की सारी त्वचा
एक पारदर्शी-सा खोल मात्र रह गयी है … !
व्यक्तित्व को स-प्रयास ठूंस दिया गया है
चरित्र को द्रव बना लेने से और भी आसानी रही .. !
निडरता मृत्यु के चिंतन से मिली नहीं ..
सत्य और असमर्थता की विभीषिका ने
डर को ही डरा कर निडर कर दिया है !
शल्क की यथार्थपरकता का उद्देश्य
टूट जाने के बाद भी टुकड़ों को समेटे रखना है !
कवि-लेखक भी अपनी सबसे प्रबल उद्वेलना,
पीठ के पीछे दिनचर्या का सारा गणित लिखते हैं !
विचारों तक क्रांतिकारी ग्राह्य हैं ..
वास्तविकता शब्दों और छंदों से परे है ..
रचनात्मकता भी अर्थ और उपलब्धता के सामर्थ्य पर निर्भर !
जो भाषा हममें से किसी की भी मातृभाषा नहीं है
समेकिकता के नाम पर राष्ट्रभाषा बना सकते हैं
बलात कोई भाषा, जन-भाषा तो नहीं बनाई जा सकती … !
लेखकों-समीक्षकों को प्रभावित करने की सीमाएं पारकर
पाठकों के लिए लिखे जाने पर अश्लीलता का आरोप-मंडन .. !
सारे ज्ञानी मित्र सलीलता की पांडवों के तरह रक्षा करते हैं
और खपने देते हैं समाज को द्रौपदी की मर्यादा सदृश
सत्ता-समर्थ दुश्शासन का अट्टहास
किसी भीम को प्रण नहीं देता
बाकी चारों भी हाथ जोड़े
नैतिकता के हरि-नाम की शरण में पूर्ववत रहते हैं...
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