चलो आप कहते हैं तो नहीं सोचता
उन सालों के बारे में
जो लौटकर वापस नहीं आयेंगे..
मैं नहीं सोचूंगा उन ख्वाबों के बारे में
जिन्हें देखने के लिए
मैंने एक अदद आँख उधार ली थी
अपनी दूसरी आँख के साथ मिलाकर
जोड़ा बनाया था ना
नहीं सोचूंगा उन रातों के बारे में
जिनके धागों में मैंने यही ख्वाब पिरोये थे
मैं चाहता ही नहीं हूँ आजादी
बड़ी मुश्किल से
अपने आवारा हाथों को बाँधने के लिए
वक़्त की रस्सियों पर मैंने इतने बल दिए थे
इतने बल की मेरी खुद्दारी भी ऐंठ जाये
रगों में उठे और गले में बैठ जाए
मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है
ना तो इश्क के ज़ज्बे से
नाही रूमानियत से
मुश्किल बस एक ही है
ज़रा वक़्त देख कर इस सरूर को सर चढ़ना था
मैंने इलाज-ए-मजलूम आशिकी पा ली है
ज़रा अपने ज़ज्बातों की हैसियत
और अपने चेहरे की कैफियत सोचकर रुकना था
लगाम देना चाहिए था सरफरोशी को
लीक से कुछ अलग हट कर करने के जूनून को
सब कुछ ख़तम हो गया इस भरम की जरूरत
हर रोज़ नए अफ़साने लिखनेवालों को होगी
मैंने तो शुरू भी इसी से किया है
और ख़तम भी यहीं करूँगा.
नहीं, आप फिर गलत समझे
ये क़दावत नहीं, नाही शिकायत है
मेरे ज़हन के कुरआन छपी हुई
एक ही चुनिन्दा आयत है..
या तो मैं अहल-ए-खुदा की असलियत
सवाल रख दूँ फरिश्तों से,जो सुनें
या फिर आप जैसे पढने-सुनने वालों की गनीमत है..
उन सालों के बारे में
जो लौटकर वापस नहीं आयेंगे..
मैं नहीं सोचूंगा उन ख्वाबों के बारे में
जिन्हें देखने के लिए
मैंने एक अदद आँख उधार ली थी
अपनी दूसरी आँख के साथ मिलाकर
जोड़ा बनाया था ना
नहीं सोचूंगा उन रातों के बारे में
जिनके धागों में मैंने यही ख्वाब पिरोये थे
मैं चाहता ही नहीं हूँ आजादी
बड़ी मुश्किल से
अपने आवारा हाथों को बाँधने के लिए
वक़्त की रस्सियों पर मैंने इतने बल दिए थे
इतने बल की मेरी खुद्दारी भी ऐंठ जाये
रगों में उठे और गले में बैठ जाए
मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है
ना तो इश्क के ज़ज्बे से
नाही रूमानियत से
मुश्किल बस एक ही है
ज़रा वक़्त देख कर इस सरूर को सर चढ़ना था
मैंने इलाज-ए-मजलूम आशिकी पा ली है
ज़रा अपने ज़ज्बातों की हैसियत
और अपने चेहरे की कैफियत सोचकर रुकना था
लगाम देना चाहिए था सरफरोशी को
लीक से कुछ अलग हट कर करने के जूनून को
सब कुछ ख़तम हो गया इस भरम की जरूरत
हर रोज़ नए अफ़साने लिखनेवालों को होगी
मैंने तो शुरू भी इसी से किया है
और ख़तम भी यहीं करूँगा.
नहीं, आप फिर गलत समझे
ये क़दावत नहीं, नाही शिकायत है
मेरे ज़हन के कुरआन छपी हुई
एक ही चुनिन्दा आयत है..
या तो मैं अहल-ए-खुदा की असलियत
सवाल रख दूँ फरिश्तों से,जो सुनें
या फिर आप जैसे पढने-सुनने वालों की गनीमत है..
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