दो दिनों पहले अपने ऑफिस के चायवाले से हुई महज़ छोटी-सी बातचीत ने इतने विकट विचारों में उलझा दिया है.. बाबूजी 16 सालों से ये दूकान अकेला ही चला रहा हूँ, और तो कुछ कर नहीं पाया जिंदगी में लेकिन बच्चों को पढ़ा लिया, तीन लड़कों में से बड़ेवाले ने जबरदस्ती दकान पर आने की कोशिश भी की लेकिन मैंने उसको कहीं और नौकरी पर रखवा दिया. आठवीं तक पढ़ा है अगर हो सके तो उसको अपने ऑफिस में लगवा लीजिये, अच्छी चाय बनाकर पिलाएगा. पढाई पूरी करे ना करे आप सबसे काफी कुछ सीख लेगा-सुन, बोलकर आदमी तो बन ही जाएगा.. उसकी माँ दोहे सुनाते हुए बार-बार कहती थी, अगर बड़का अगर ठीक से पढ़-लिख लिया तो एक दिन बहुत नामी किताब लिखेगा. ऊ जो राम बाबू लिखे रहें, ऊ से भी मोट....बेचारी चलिए गई बकते-बकते और उसकी पढाई भी खा गई.........
कवितायेँ, उपन्यास, साहित्य, इतिहास, राजनीति......... भूखे पेट कोई किसी भी कला को सम्मान नहीं दे सकता... तो क्या शब्दों के सारे सिपाही भी अपनी-अपनी भूख से हारकर, ग़रीबों के दर्द बांटने के बजाए लालफिताशाहों और सियासतबाज़ों की तरह खूबसूरती की तारीफ़ और बुज़ुर्ग आलिम-ओ-फाज़िलों की अटकलों पर चलते रहेंगे?? कशमकश ने जबरन कुछ लिखवा दिया है .......
भूख को
कविताएँ कतई पसंद नहीं होती
प्यास से
संगीत, अच्छे सिनेमा की बातें करोगे
ज़वाब में मिलेंगीं सूखी गालियाँ
मिहनत से
पूछकर देखना धीरज के बारे में
मुंह बनाकर आगे बह जाएगा पसीना
आदत से
ज़रा-सी नसीहत करके देखो ज़ब्त की
अक्ल और कुछ भी फेंककर मारने दौड़ पड़ेगा
क़िल्लत को
मंहगाई की वजहें समझाने पहुँचो
नैतिकता और बराबरी का उल्टा ब्रेनवाश हो जाएगा
ग़रीबी से
मत पूछना इन्द्रधनुष में खिले रंगों के नाम
शरमा जाओगे अपनी अकर्मण्यता और
अपने ही पुरखों की वहशियत याद करके
रगों में बहते तुम्हारे खून का रंग
अक्षरों के रंग में मिल जाएगा
वोही एक ही रंग
जो अमीर-ग़रीब में फरक नहीं करता
इंसानी रगों से बाहर आते ही
सारे रंग यूँ ही जम जाते हैं
शराफत की काली मिटटी में दबकर या
खुदपरस्त मजबूरियों की काली राख होकर.......................
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