Wednesday, 2 May 2012

बस अभी-अभी

बस अभी-अभी
हसीं याद-ए-चिलमन, परदे सरके हैं 
लफ्ज़ निकले जिंदा तारीफों के
लाजिम नियत-ए-ज़वाब 
शर्मिंदगी के गले अटके हैं 

इसानियत की कदरें लेकर
तलाशना अमन फरिश्तों को
बस अभी-अभी 
मुर्दानशीं, भिखमंगे ख्वाब,
हकीकत की आँखों चटके हैं 

बेइंतेहा नामुमकिन है 
हर खूबसूरत अशआर को ग़ज़ल बना लेना
बस अभी-अभी 
हसरत-ए-आवारा मुसाफिर,
ज़ज्बा-ए-पाक़ राहें भटके हैं 

बला की शोखी, कमसिन 
ख़मीर-ओ-मुफलिस उनींदी शाखें 
बस अभी-अभी
दो-चार अजनबी शरारती इशारे 
वक़्त की उम्मीदों पर लचके हैं

मौकापरस्ती से मिलकर
खुदगरजी क्या अजीब रंग लाई है
बस अभी-अभी
मुसव्विर जिंदगी के ब्रुश गले लग कर 
लम्हों के केनवास मटके हैं..


कदरें= उसूल; ख़मीर-ओ-मुफलिस= materialistic inheritance  

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