सुबह सुबह राजू मम्मी के आँचल में सुबक रहा था. वही रोज़ की कहानी- मम्मी आज फिर मैं दीदी की वजह से लेट हो जाऊँगा, मुझे फिर पीछे बैठना पड़ेगा.. मम्मी अपनी अस्त व्यस्तता झिड़क कर निकालती है- राजू तुम्हारा सुबह सुबह पिटने का मन तो नहीं हैं ना? सहम कर राजू पापा की तरफ रुख करता है- पापा और उनके तीन दोस्त किसी क्रांति की बात कर रहे थे.. सबकुछ ठीक रहा तो आज बिना मार स्कूल से बच सकता हूँ, सोचते-सोचते राजू जाकर खड़ा हो गया मिहिर अंकल के और पापा के बीच में. बिना चाहे भी उनकी बातें कानों में पड़ती रहती रही- कामरेड होना और बात है लेकिन होलटाईमर बनने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए... क्या बेफजूल की बातें हैं एक पोपिंस तो लाया जाता नहीं इनसे और मम्मी कहती हैं- बहुत बड़े-अच्छे आदमी हैं मिहिर अंकल, पापा भी उनको बहुत मानते थे.. पापा ने आवाज़ दी- तुमलोग स्कूल के लिए लेट हो जाओगे ज़ल्दी निकलो और फिर दीदी के हाथ में दो रूपए का सिक्का पकड़ा दिया. पापा भी ना दो एक रूपए के सिक्के नहीं दे सकते थे क्या?? हुंह..
पूरे रास्ते राजू सोचता हुआ जा रहा था- आज वो दस पैसे वाला पाचक एक ही लूँगा, जेम्बो लेना ही पड़ेगा ज्यादा दाने होते हैं ना उसमें दो-दिन चलेगा. अरे लेकिन पैसे तो दीदी के पास हैं!! अभी वो अपना ज्ञान झाड़ेगी- पाचक में गंदगी वाला नमक होता है, जेम्बो खाने से दांत सड़ जाते हैं और पता नहीं क्या क्या?? दीदी अपने दोस्तों की भी नाकों में दम कर देती होगी ना?? मज़े-मज़े में स्कूल आ गया और राजू अपनी कक्षा में जाकर बैठ गया.. मगन था सारे होमवर्क करके आया था, एक-एक लेस्संस याद करके.. राजू को स्कूल बहुत पसंद था, सारी मिसेज भीं.. अनीता मिस को देखकर तो वो हमेशा सोचता था- काश मैं अनीता मिस का बेटा होता.. कितनी अच्छी थीं अनिता मिस.. कितनी सुन्दर-सुन्दर साड़ियाँ थीं उनके पास और वो मम्मी और बाकी मिस लोगों की तरह आधी बाजू की ब्लाउज भी नहीं पहनतीं हैं. अपनी पेंसिल को बराबर छीलता हुआ बीच-बीच में निकाल कर देखता है- बापरे! आधी रह गयी है!! अभी कल ही मम्मी ने दी थी.. लेकिन मम्मी को ये क्यूँ समझ में नहीं आता की अच्छी लिखावट के लिए पेंसिल की नोक सही रखनी पड़ती है.. अनीता मिस क्लास में आने से पहले साड़ी क्यूँ संभालती हैं हर बार?? अरे मिस आ गईं.. गुड मोर्निंग मिस!! राजू रोज़ जान बूझकर बाकी बच्चों से पीछे ये बात बोलता है लेकिन मिस रोज़ उसके ख़तम करने से पहले गुड मोर्निंग बच्चों कह कर बैठ जाती हैं..
छुट्टी की घंटी एकदम से हड़बड़ा देती है राजू को- पैसे तो दीदी के पास हैं?? तो क्या हुआ? लौटकर मम्मी के पास तो जाएंगी ही.. और मम्मी के न्याय राजू को पूरा भरोसा था.. टॉफी के बराबर टुकड़े करती हुई मम्मी उसको 'अदालत' फिल्म की वो सफ़ेद वाली मूर्ती दिखती थी तराजू के बदले अपना सुपाड़ी काटने वाला सरौता हाथ में लेकर मम्मी बिलकुल सटीक, बराबर हिस्से करती है हर chocolate के.. दीदी का हिस्सा ज्यादा बड़ा है कहकर पैर पटकने में कोई भलाई नहीं है राजू को मालूम था. ऐसा करने से पूरी टॉफी मम्मी के हिस्से में चली जाएगी और फिर उसको दीदी के गुस्से का भी डर था..
घर आ गया था.. राजू की नज़र बरामदे में खड़े छोटे मामा जी पर क्वार्टर कम्पाउंड में घुसते ही पड़ गयी थी. लेकिन दीदी ने तो बताया था की नानी माँ भी आएंगीं, उल्लास में छोटे कदम भाग पड़े.. आँगन में पहुँचते ही ठिठक कर रुक गया. ट्रंक बाहर बरामदे में क्यूँ रखा है? बैग, VIP सब पैक होकर बाहर रखे हैं!! मिहिर अंकल कुर्सी पर चाय पीते हुए मुस्कुरा रहे हैं.. मम्मी की आवाज़ थप्पड़ से भी ज्यादा तेज़ थी- राजू जाकर कपडे बदल लो.. ऐसा लगता है मुम्मी बहुत रोईं हैं, उस दिन जब कल्पना को punishment मिली थी तो उसके भी बाल बिखर गए थे.. लेकिन मम्मी को punishment कौन देगा?? पापा कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं?? दीदी चुपचाप कपड़े बदल कर मम्मी की बगल में आकर कड़ी हो गयी थीं. राजू के इशारे पर मम्मी की तरफ देखते हुए उसका का हाथ पकड़ कर पापा के कमरे में ले गयी. दोनों रैकों के बीच खड़े होकर दीदी बिलकुल मम्मी की आँख में आँखें डाल कर राजू को समझा रही थी- मम्मी का मूड ठीक नहीं है, तुम फिर से अपने सवालों के खेल में मत लग जाना. आज रात को हम लोग पटना जा रहे हैं, जाने से पहले फिर मार पड़ जाएगी , पिछली बार की तरह सूजा हुआ मुंह लेकर जाना वहाँ घूमने. अब राजू से रहा नहीं गया- हम लोग घूमने जा रहे हैं? दीदी की आँखों में अब और देखने की हिम्मत नहीं हुई उसकी..
कैपिटल एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर एक पर आएगी. लेकिन मामाजी, मिहिर अंकल से बात कर रहे थे दानापुर एक्सप्रेस में इतना भीड़ होता है- दो ही टिकट कन्फर्म हो पाया है. मिहिर अंकल फिर मुस्कुरा रहे थे- कोइ बात नहीं टीटी से बात कर लेंगे.. दीदी हमलोग तो प्लेटफार्म नंबर एक पर खड़े हैं?? यहाँ पर तो कैपिटल एक्सप्रेस आनेवाली है? दीदी खा जाने वाली आवाज में बोली- राजू!! दानापुर और कैपिटल दोनों एक ही ट्रेन है.. लेकिन एक ट्रेन के दो नाम क्यूँ? इस बार राजू मन ही मन बोला था.. प्लेटफार्म पर ब्रीफकेस पर बैठना राजू को बड़ा पसंद था. इतना मज़ा उसको ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर बैठने में भी नहीं आता था.. मिहिर अंकल ने फिर से उसको चिढ़ा दिया- राजू ट्रेन आने वाली है, तुम थर्मस तो उठा ही सकते हो .. मामा जी कुलियों से बात कर रहे थे थे- पचास रूपये देंगे - ट्रंक, बेडिंग और ब्रीफकेस चढ़ा दो 71, 72 सीट है, गेट के पास ही है. बूढ़े कुली ने बेकार बेकार कोशिश की- भैया, 60 रूपा लगतौ. मामाजी सधे थे 50!!
ट्रेन में सब सामान चढ़ गया लेकिन मम्मी का गुस्सा अभी भी चरम पर था.. राजू ट्रंक ठीक बीच बैठकर कधों को झुकाकर खिड़की से बाहर की तरफ देखे जा रहा था. मम्मी मिहिर अंकल के साथ नीचे उतरीं तो राजू से रहा नहीं गया- दीदी, इतना सारा सामान लेकर घूमने क्यूँ जा रहे हैं ? पापा नहीं जा रहे हैं हम लोगों के साथ? वो कोमिक्स लाने गए हैं ना? मिहिर अंकल भी हमलोगों के साथ जाएंगे?? क्यूँ , मामाजी तो जा ही रहे हैं?? राजू का दायाँ कान कुछ मिनटों के लिए सुन्न हो गया !!! मम्मी अन्दर आ चुकीं थीं, मामाजी नहीं होते तो शायद दूसरा कान भी सुन्न हो चुका होता. मम्मी को कांपते देखकर ट्रेन चल पड़ी. मामाजी के दोनों हाथों में छुपते हुए राजू को प्लेटफार्म पर पापा दिख गए, राजू खिड़की की तरफ लपका तो पापा ने मामाजी को थैला पकड़ा दिया . राजू ने झपट कर जैसे ही उसे पलटा- चाचा -चौधरी के दो कोमिक्स और तीन पोपिंस के पैकेट गिर पड़े बर्थ पर.. मम्मी का हाथ राजू से ज्यादा तेज़ था, उन्होंने सब वापस उसी थैले में समेट कर फ़ौरन बाहर फेंक दिया .. लेकिन तीन में से पोपिंस का एक रोल, मम्मी की नज़रों से बचकर गेट की तरफ लुढ़क रहा था.. लेकिन मिहिर अंकल की नज़रों और उनकी मज़बूत पकड़ से बचना राजू के लिए नामुमकिन था. और लुढ़कता हुआ पोपिंस गेट से बाहर गिर गया. मम्मी की दो एक चूड़ियाँ राजू को पीटने में हमेशा शहीद हो जाती थीं.. इस बार कुछ ज्यादा ही मारकाट हुई.. मम्मी का हाथ भी कट गया था शायद? राजू की हिस्कियां गले में सुबक रहीं थी, मामा जी और दीदी एक-दूसरे की ओर नहीं देख रहे थे.. मिहिर अंकल ने जब तक मम्मी की कलाईयों पर dettol लगाया, उनका मूड थोड़ा ठीक हो चला था. अपना पर्स खोलकर मम्मी ने एक किस मी बार निकाल कर राजू को दिया - बिलकुल लड़कियों की तरह रोते हो तुम राजू.. राजू ने चुपचाप सर हिलाकर टॉफी लेली.
पहले टुकड़े ने ही राजू का मन फेर दिया. उसे इलायची की खुशबू पसंद नहीं थी, उसे तो चटपटे रंग - बिरंगे पोपिंस पसंद थे. और मम्मी को भी तो पसंद थे?? नींद और सवालों ने फिर से राजू के पेट में गड़बड मचा दी है.. दीदी ठीक ही कहती थी पाचक में गन्दगी वाला नमक होता है. लेकिन पापा हमारे साथ क्यूँ नहीं आये? वो प्लेटफार्म भी छुपे हुए थे? उनकीं आँखें भी लाल थीं? क्या उनको भी punishment मिली थी? लेकिन मम्मी, पापा दोनों को punishment कौन देगा? ट्रेन तेज़ हो गयी थी और सवाल लोरी गा रहे थे.....................ऐसी लोरी जो मम्मी ने पहले कभी नहीं गाई थी.........................

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