Thursday, 3 May 2012

शायरी


खानसामा नहीं है शायरी
दौलतमंदों की बिगड़ी औलादें
नुमायाँ गरीबों की भूख को
ज़ज्बों को परोसकर हरूफों में
पेट भर कर तारीफों के
दिल्लगी, वाह-वाह और शुक्रिया अदायगी

नक़ाब नहीं है शायरी
संगीन इंसानी इरादों के रुखसार ढकने
रेशमी लफ़्ज़ों का काला बुरखा
सिर्फ गर्दन के ऊपर-ऊपर रखना
पढने, लिखने, सुनने के तमाम ज़रिये बसर
आवाज़ ज़मीर तक पहुँचने की नौबत नहीं आएगी


कलम-ए-खुद्दार मुमकिन है शायरी
आवाज़ बेनज़ीर ज़मीरों पहुंचाएगी
नसें भरीं होंगीं इंसानी लहू की सियाही
हूक उठेगी कमसिनों की लरजकर
दुनियादारों के तख़्त-ए-ताउस गिराएगी....

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