कितने चैन-ओ-सुकून तलब हैं
आवारगी के फलसफे......
साथ चल दिया तो जान-ए-ज़िगर
हमसफ़र,
ना साथ चला
नूर-ए-नज़र कोई और था.
साथ रह गयी तो आदत
इबादत,
ना साथ रही
मुहब्बत कोई शौक था.
सजा कर गयी तो आहट
मुस्कुराहट,
ना सजा सकी
कंपकंपाहट, कोई खौफ़ था
सीख कर गयी तो शायरी
दुनियादारी,
ना सीख सकी
रियाकारी, कोई बेलौस था
'आलिम' की गवाही 'फ़ाज़िल' देगा?
कुरआन-ए-इश्क
लिक्खी आखिरी आयत
जिंदगी नहीं कोई मौत था...
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