१)
सुबह शुरू होगी उलाहने से
इतनी देर तक क्यूँ टिकी रही शबनम
पंखुड़ियों की तह तक
पहुंचेगी गुस्सैल दुपहरी
गर्मी इतनी बढ़ेगी मई महीने की
पेशानी से सारी बूँदें,पसीने सुखा देगी
ना चाहकर भी दिन को चढ़ना होगा
भूख-प्यास के तराजू टांग
फेरी लगानी है तंग बेईमान गलियों में
शाम तक कुछ बाकी-बिक्री
सिला बारहा बिकते रहने का
बचा खुचा वजूद समेत कर
शब्-ए-फुरक़त फिर मुस्तकबिल ख्वाब
ज़मींदोज़ इशारे उम्मीद-ए-सहर
फिर से लौटकर आनेवाले हैं
कहाँ छुपकर बैठी रहेगी पूरे चौबीसों घंटे
ज़ज्बा-ए-पाक़ सुस्ताती रहेगी
अगले दस दिनों तक
गुमनाम आशिकों के मजारों
दलीलें लिखती-पढ़ती रहेगी
हरूफों से शिकायत करने का जी करेगा
और जिंदा गफलतों में गुम होकर जियेगी..
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