वक़्त बदल रहा है
बुजुर्गों की हिदायतें बदलनी चाहिए.
सही-गलत दलीलें, तमाम किताबें भरीं हैं
वक़्त बदल रहा है
दुनियादारों की कवायदें बदलनी चाहिए
किसके पुरखों ने कौन-से गुनाह किये है
किसने मंदिर-ओ-मस्जिद सब तबाह किये है
वक़्त बदल रहा है,
माज़ी-ज़हनों ज़बरन भरीं, तिजारतें बदलनी चाहिए
वो बाँट देते हैं और हम बँट जाते हैं
अपने-अपने हिस्से, तारीफें छांट लेते हैं
वक़्त बदल रहा है
लफ्ज़-शराफतों की शिकायतें बदलनी चाहिए
पूँजी-दाराना सियाह रातें
ग़ुलाम-ए-खमीरी चिरागों रौशन ना होगी
वक़्त बदल रहा है
ख़ाक-चिंगारियों की खिलाफतें बदलनी चाहिए
अबके ज़वान हो कलम से
कुछ हकीक़त की गफ़लत करो
बजाये ख़िलअत-ए-इश्क सजाने
असलियत के नंगे जख्मों, ज़माने के नेमत करो
वक़्त आ गया है शायरों!!
इल्म-ए-शायरी रिवायतें बदलनी चाहिए..
बुजुर्गों की हिदायतें बदलनी चाहिए.
सही-गलत दलीलें, तमाम किताबें भरीं हैं
वक़्त बदल रहा है
दुनियादारों की कवायदें बदलनी चाहिए
किसके पुरखों ने कौन-से गुनाह किये है
किसने मंदिर-ओ-मस्जिद सब तबाह किये है
वक़्त बदल रहा है,
माज़ी-ज़हनों ज़बरन भरीं, तिजारतें बदलनी चाहिए
वो बाँट देते हैं और हम बँट जाते हैं
अपने-अपने हिस्से, तारीफें छांट लेते हैं
वक़्त बदल रहा है
लफ्ज़-शराफतों की शिकायतें बदलनी चाहिए
पूँजी-दाराना सियाह रातें
ग़ुलाम-ए-खमीरी चिरागों रौशन ना होगी
वक़्त बदल रहा है
ख़ाक-चिंगारियों की खिलाफतें बदलनी चाहिए
अबके ज़वान हो कलम से
कुछ हकीक़त की गफ़लत करो
बजाये ख़िलअत-ए-इश्क सजाने
असलियत के नंगे जख्मों, ज़माने के नेमत करो
वक़्त आ गया है शायरों!!
इल्म-ए-शायरी रिवायतें बदलनी चाहिए..
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