उम्मीद के दीयों की बीनाई
कब्जाने के फ़िराक में
खालिस जलने का ज़ज्बा सिखाते
बड़े-बुज़ुर्ग, आलिम-ओ-फ़ाज़िल
क्यं भूल जाते हैं
चिरागों के तले ही तीरगी छुप जाती है...
क्यूँ नहीं सुलगने देते हैं हर बाती को
बिला खुदपरस्ती के तेल भर कर
क्या डर है उन्हें,
की कंक्रीटों के बसाए उनके जंगल
जला डालेंगीं कमसिन बेबाक चिंगारियां...
यक़ीनन उन्हें गौर करना चाहिए था
की बेचने के लिए जो भी कुछ बोया था
खाद की तरह इस्तेमाल की गईं
मजलूम ख़्वाबों की लाशें
रूह बनकर लफ़्ज़ों की
ऐसी आंधी-तूफ़ान बनकर आएंगीं
हवा देकर जलाती जाएंगी
इक नई शाख को
हर बार अपने बुझने से पहले....
खौफ़ भी नहीं खाते हैं क्यूँ
मजलूमों के दर्द-ओ-ग़म बेचते हुए
भूख से मारों को दूर से रोटी दिखाते हुए
जिस किसी भी दिन बगल में
सड़ते हुए अनाजों की बदबू में
छुपकर बैठे हुए मोटे आदमखोर चूहों पर
गंध घुस गयी अगर
नए 'मुसहरों' की नाक में
याद दिला देंगे अपनी जात की असलियत...
झुठला देना भर या भूलकर
अपनी, हाँ अपनी-ही बीवियों-बच्चों को
सूखे होठों और सूनी कलाईयों को
शिकार करके मोटे-पतले चूहों को
मिला देगा सारे गोदामों में
सल्फास की गोलियां चूरकर
बचा लेगा वो अपनी जात
और मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने वाले
सारे शाकाहारी तक मारे जाएंगे
.........
क्या डर है उन्हें...
ReplyDeleteसुन्दर कविता है.
This comment has been removed by the author.
DeleteSpeechless....
ReplyDeleteThanks
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