Saturday, 16 June 2012

दिल..

मुआफ कर अब हमें भी मासूमियत की अदा से 
गम-ए-ज़ज्बा-ए-पाक से, परवाज़ कर हमें ऐ फितना दिल

मुसाफिर था वो जो चला गया अपने वतन को 
शब्-ए-इंतज़ार खाली रास्तों पर,रोएगा अब कितना दिल

चलो कोई नई शब्-ए-गम ढूंढ लें, खुद्दारी ही दफ्न करें 
उमरें लगीं खाली रातों, बातिन आवाजों को क्या करना दिल 

हसरतों को अबके शगुफ्तगी ओ खुदपरस्ती देना 
हुस्न-ओ-बीनाई फिरसे ख़ाक़-कुर्बत में ना मर मिटना दिल

मुमकिन है नसीम कभी माजी पन्ने उलट दे
वुसअत-ए-अश्क संभालकर, आरिजों पर लिखना दिल

शौक-ए-शीशागरी को सिर्फ खुद की दुआ लगे है
वाइज़ के हाथों तमाम संगरेज़ों से, इल्जामों से ना डरना दिल

जलाते रहना तखइल चिरागों, किसी वहम-ओ-गुमाँ से
शनासाई मरगूब नज्मों से, कोई गोशा छुपाए रखना दिल..............



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