Saturday, 16 June 2012

सीखाए देता हूँ..

जागती आँखों से कोई सपना देख लेता हूँ 
शर्मिंदगी जल रही है लफ़्ज़ों, मैं आँखें सेंक लेता हूँ 
क्या करूँ गर इल्म-ए-शायरी भी रूठ रही है 
जाते-जाते और अशआरों के रेज़े फेंक देता हूँ

मुहब्बत को शिक़ायत सुनते हो तुम 
मैं नफ़रत को भी दुआएं देता हूँ 
जहाँ के दर्दों का इलज़ाम तुम सिफर कर दो 
मैं तमाम इलज़ाम-ए-इश्क-ओ-कसूर लेता हूँ....

तुम मेरे उम्मिदों की वहशी रगें काटो
अपने ही खून से शायद मेरी प्यास बुझे
तुम दलीलें देना सजा-ए-कतल जरूरी
मैं फिलवक्त आवारगी को भिगाए देता हूँ......

जब करो ज़ज्बातों को जिबह
हालातों को संगीन इरादों का अंदाज़ा ना हो
मक़तूल मर्ज़ी से सूली चढ़ा तो, जिन्दा रहेगा
ताउम्र तुम्हारे ज़हन की आँचल किनारे गाँठ बन
चलते-चलते मैं मौत को भी इब्तदाएं सीखाए देता हूँ..

No comments:

Post a Comment