वो जो चली गई, वो खिज़ा थी
टूटे पत्तों ने मुफलिस शाखों को समझाना है
वो जो रूठ गई, वो हवा थी
मौसमों को कब तबीयत पूछकर आना-जाना है
वो जो बह गई, वो घटा थी
लहरों ने चंद रोज़ ही साहिल का कहा माना है
वो जो बुझ गई, वो शम्मा थी
परवाने के परों लगकर नाहक़ रात को जलाना है
वो जो मुड़ गई, वो अदा थी
हुस्न ने आवारगी से कब तक साथ निभाना है
वो जो गुजर गई, वो लम्हा थी
उमर की जूस्तजू सर लिए क्या कोई एक ही दीवाना है
वो जो बिखर गई, वो शीशा थी
वजूद को टुकड़ों में बांटकर मुझेभी नाम कमाना है
वो जो उमर गई, वो निदा थी
अजां में फिर भी खुदा का नाम शायरी राग पुराना है
वो जो सिमट गई, वो खुदा थी
उज्र काफ़िर क्यूँ ना रखे बुतपरस्ती का ज़माना है.......
टूटे पत्तों ने मुफलिस शाखों को समझाना है
वो जो रूठ गई, वो हवा थी
मौसमों को कब तबीयत पूछकर आना-जाना है
वो जो बह गई, वो घटा थी
लहरों ने चंद रोज़ ही साहिल का कहा माना है
वो जो बुझ गई, वो शम्मा थी
परवाने के परों लगकर नाहक़ रात को जलाना है
वो जो मुड़ गई, वो अदा थी
हुस्न ने आवारगी से कब तक साथ निभाना है
वो जो गुजर गई, वो लम्हा थी
उमर की जूस्तजू सर लिए क्या कोई एक ही दीवाना है
वो जो बिखर गई, वो शीशा थी
वजूद को टुकड़ों में बांटकर मुझेभी नाम कमाना है
वो जो उमर गई, वो निदा थी
अजां में फिर भी खुदा का नाम शायरी राग पुराना है
वो जो सिमट गई, वो खुदा थी
उज्र काफ़िर क्यूँ ना रखे बुतपरस्ती का ज़माना है.......
No comments:
Post a Comment