Thursday, 21 June 2012

उबलना क्यूँ जरूरी होता है??


उबलना क्यूँ जरूरी होता है
आराम से सोचते हुए लिखना
ख्वाब, ख्वाब ही रहते हैं कई

कविता सिर्फ पढने के लिए होती है क्या
कुछ सुनाने के के लिए क्या लिखना चाहिए

अक्षर सिर्फ शब्द बनकर रह जाते हैं
उम्मीद के रास्ते घेरकर
परछाइयां हमेशा छुपकर नहीं बैठती

वनस्पति ज्ञान पढ़कर
फलों की विविधताओं को बेचना
इतना मुश्किल होता है
और मैंने सुना था
कुंदन जल कर लाल होता है!!

किसके 'यलगार' बोलने से
जंग शुरू हो जाएगी
ढूंढते हुए उस 'सेनापति' को
कैसे परखेंगे छद्मवेशियों को
क्या सिपाही फिर से उतने ही मारे जाएंगे??

बदलाव की सोचते ही
जिम्मेदारियों, चुनौतियों से घबराहट होती है
यायावरी, पीठ मोड़ते हुए
किसी और ही शक्ल में आती है..

छुपने की कोशिश शायद जीतने की हो
वक़्त बीतेगा तो हिम्मतें परखीं ही जाएंगी...
 

1 comment:

  1. अक्षर सिर्फ शब्द बनकर रह जाते हैं
    उम्मीद के रास्ते घेरकर ....bahut khoob.

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