Monday, 9 April 2012

अर्ज़ है..

सब भूल जाते है, पीछे के पढ़े पन्ने
उलट देते हैं सारी अकलियत सभी 
अपने  हाथ भी अभी, उमर की पतली किताब है

दिल्लगी किसी शहजादे ने की 
पैमाइश दी, मुहब्बत को दौलत की
हाथ काटे  तो संतराशों के थे उसने  
आज कितने गरीब आशिकों का खाना-खराब है

उपरवाले ने तो ज़मीन दी ही थी चलने को
नज़रों को खुदगर्जी से करो हल्का
फिर चाहे जिस मर्ज़ी पे चल दो, लीकें बेहिसाब हैं

तौल-तौल कर कमतर कर देती किस्मत हसीं लम्हों को
दोबारा से रटे हकीकत के पहाड़े जिंदगी
गर्द-ओ-ग़म ,शब्-ए-फुरकत का, बड़ा लम्बा हिसाब है   

परे रक्खो वफ़ा की ग़फलत, ज़ेबाइश दिल्लगी की कम ना होगी
अजनबी अशआरों के ज़ाम तोड़ो वाइज़ पर
शायरी करते रहो, कहते रहो- ये कैसा हिज़ाब है....

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