Friday, 20 April 2012

बहाना है..

बेतरतीबी में भी ख़ूबसूरती होती है,
वरना तो ये एक महज़ बहाना है
तारीफ़-ए-हुस्न कोई खुशनुमां ग़म
चेहरे के तिल का ऐब छुपाना है.
वो जो कहते हैं, तामीरी पुरखुलूस नहीं
ज़ज्बातों की शायर लफ़्ज़ों में
इतनी नादाँ क्यूँकर है रात,
टूटते तारे से जलती बुझती है
क्या उसको नाम कमाना है
ना करे शिकवा शय सदी से,
ना गिला लम्हों को गुजरते वक़्त से,
हमद-ए-ज़बां है बेशरम
फिज़ा आधी नंगी है बेबाकी का ज़माना है.
ऐय्यारी-ए-अशआर-मुहब्बत कभी
तुमभी नज़र करो चिलमन-ए-ख्वाब
साहिर-ए-नज़्म गुमनाम सही
इश्क-ए-शम्मां,मुरीद इक और दीवाना है
वाइज़ लापरवाह ही रहे मुमकिन
ग़म-ए-शौक-ए-आवारगी से
वरना हमगरीब, हमशौक, हमखला
बेनज़ीर ग़ज़लों का कोई और ठिकाना है?
हिचकियाँ लो जो कभी मय खला के
सरूर-ए-इश्क करोगे तौबा यक़ीनन
रंगीं अल्फाजों की महफ़िल,
शदीद-ए-खुदी से मयस्सर मयखाना है
मैं कहूंगा और तुम मानोगे नहीं
बाद जलने के पर-ए-तसव्वुर
कमसिन कन्धों बारहा सख्त उगे
ग़ज़ब खुदा-ए-ख़ाक वो बेफिक्र परवाना है
अबके आएँगे तो नक्शा बना लाएँगे
रूह-ए-जां-ए-इंसानियत की मज़ार को
कोशिश-ए-दुनियादारी की चादर लेकर
कौनसे मोड़ ठहरना है और किस राह जाना है
जाने इस नज़्म को किसकी आह लगी
मुस्तकिल बढती चली जा रही
दिलरुबा शरारा-ए-तसव्वुर अब
दो पलक ज़रा आराम दे,सुबह फिर आफ़ताब सर आना है
नापसंदगी फिर से ज़ब्त करना
मेरा इम्तेहान-ए-शौक सिफर करना
समझ लेना तरकश के तीर ख़तम
नज़्म ये भी अदद नींद की खुदगर्जी,छुपाने का बहाना है


Image Courtsey - Bird perched on rocks, Mughal painting, c. AD 1610; in the State Museum, Hyderabad

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