शब्-ए-फुरकत की सियाही फिर दाग़दार चाँद लिखा हमने
आज फिर तुम ना आईं खिड़की पर उसे ही टांग दिया हमने
कैसे आँखें खुलीं रक्खूं बेगैरत हरूफें मुस्तकिल बहे हैं
आब-ए-खला-ए-वहशत आँखों से गिरी, लबों पर थाम लिया हमने
यूँहीं बसर हुई जाती, वुसअत-ए-कतरा-ए-मुहब्बत
दिल-ए-नादां तेरे संगरेज़े वक़्त की दानाई के दामन बाँध दिया हमने
कभी फुर्सत में बैठी कोई शाम आ जाए यक-ब-यक मिलने
जिस्म-ए-आवारगी की लरज़, हाफ़िज़-ए-ख़ाक तुझे ही इलज़ाम दिया हमने
अबके सावन कोई शऊर-ए-ज़ब्त मुफ्त बांटेगा दर-दर
नक्श-ओ-निगार मौसम-ए-वफ़ा के, हिर्स-ए-तवज्जो के नाम किया हमने
समा'अत साथ न देती कभी रफ़ाक़त-ए-सुरूर नामंज़ूर
शिकवा-ए-शीशागर भी लाजिम, अल्फाजों को यूँहीं बदनाम किया हमने
दुआ करो तुमभी साथ मिलकर के ज़बां से उफ्फ़ न निकले
अबरार-ए-खमीरी के ख़ालिस-मोमिन असरारों को सर-ए-आम किया हमने
अश्जार-ए-खला उग आये जो ज़ेहन के सहन-ओ-मकाँ
यास लम्हों की टहनी बनाकर ख़ामा, मासूम शिकवों को दिल-ओ-जाँ लिखा हमने
मुस्तकिल= लगातार; वुसअत-ए-कतरा-ए-मुहब्बत= प्यार के बूँद का फैलाव
संगरेज़े= पत्थर के टुकड़े; दानाई=अक्लमंदी ; जिस्म-ए-आवारगी= झूठ की देह; हाफ़िज़-ए-ख़ाक= ख़ाक की हिफाज़त करनेवाला(खुदा); शऊर-ए-ज़ब्त= धैर्य का सलीका ; नक्श-ओ-निगार= features ; हिर्स-ए-तवज्जो= greed of attention ; समा'अत= सुनने की क्षमता ; रफ़ाक़त-ए-सुरूर= नशे का साथ; शिकवा-ए-शीशागर= शीशा बनानेवालों की शिकायत; अबरार-ए-खमीरी= भौतिकता के पुजारी; ख़ालिस-मोमिन= worthlessly sacred ; असरार= राज़; अश्जार-ए-खला= अकेलेपन का पेड़; सहन-ओ-मकाँ= घर और आँगन; यास= उदास; ख़ामा= कलम
Image Courtsey - Google

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