Thursday, 26 April 2012

बिना मौसम की बारिश!!

बिना मौसम की बारिश में
चटपटी-सी आवाजें उछल रहीं थीं
रेहड़ियों, टिन की चद्दरों, तिरपालों पर
थोड़ी मस्ती और गोलगप्पे का तीखा पानी
आज के मज़े भीगते हुए ले लो
कल की सेहत की किसको पड़ी थी....

बिना मौसम की बारिश में
शर्म सहम कर, बहाने से
छुप रही थी गीले दुपट्टों में
देर हुई घर पहुँचने में, तुमने देखा नहीं?
बड़ी जोर की बिजलियाँ  कड़क रहीं थीं
खैर!! एक-दो पाँव डूबी पुरानी सीढियाँ
घंटों तुम्हारे आने का रास्ता देख रही थी...


बिना मौसम की बारिश में
लगातार दफ्तरों से छूटे सिक्कों के कैदी
नोटों के नाव में चढ़कर भी मज़ा ना कर पाए
अक्सर जिन गड्ढों के लिए
नगरपालिका गालियाँ सुनतीं हैं
आज अल्हड़ों को कितना मज़ा दे रही थी...


बिना मौसम की बारिश में
सड़क के बीचोबीच क्यारियों में
बाएं पैर के जूते से बना एक निशान
लम्हों-नज़रों की गिलहरी कूदी- छपाक!!
इतना हल्का वज़न और
हाथ-भर दूर उछल कर गिरीं छींटें
थोड़ी-सी और बरसी होती
धुलने को तैयार थीं तंग-गलियाँ
उदासी की उमस अबतक चिपचिपी हो रही थी..........


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