सुनना, बोलना और लिखना
इतना आसां क्यूँ नहीं
अम्ल ज़ज्बातों पर अमल करना
चलना, थकना और रुकना
इतना आसां क्यूँ नहीं
ज़िंदगी का मौत की तरफ बढ़ते रहना
आना, ठहरना और चले जाना
इतना आसां क्यूँ नहीं
लहरों का साहिल पर टिके रहना
देखना, याद करना और फिर भूल जाना
इतना आसां क्यूँ नहीं
हर नज़र एक ही मंज़र का रुके रहना
पढ़ना, गुनगुनाना और गम हो जाना
इतना आसां क्यूँ नहीं
उसी ग़ज़ल का होठों पर गिरते रहना
लेना, देना और हिसाब रखना
इतना आसां क्यूँ नहीं
कुदरती नेमतों को यूँही बिना तोड़े रखना
तौलना, खरीदना और चुकता होना
इतना आसां क्यूँ नहीं
दुनियाभर की मुस्कुराहटें उधार लिए रखना
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