Tuesday, 24 April 2012

गुजरे..........

गुज़री कितनी जिंदगी,
कितने हमसफ़र गुजरे
तसव्वुर की फैली चांदनी,
टूटते तारों चमकती रौशनी
कितने रहगुज़र गुजरे

चाँद-चेहरे पे कोई दाग है
शुबहों को तीरगी घेरे
परछाईयों के साए भागती
सोच में पड़ते हुए सवेरे
घड़ी के साथ चले, दिन-भर गुजरे

शाम शर्मा गईं गरूर से
आब-ए-खला, जिंदा सरूर से
रूठ बैठी शब्-ए-फुरकत 
आँखों ख्वाब के बादल घनेरे
बूँदें,चेहरे पर दरया, समंदर गुजरे


खामोशी सुनसान काबिज़ है
साँसों की आवाज़ नाजायज़ है
परत दर परत उतरती उबासी
हकीकत से कब-तलक छुपेगी
बीनाई बनकर दो बाब हमनज़र गुजरे


सिर्फ जुगनुओं की सदा है
तीरगी कहाँ तक रुकी रहेगी
माज़ी के पन्नों कब तक
तुम्हारे इंतज़ार के बहाने लिखेगी
सकूं-ओ-नींद से हासिल पल भर गुजरे



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