Sunday, 15 April 2012

बदल जाते हैं....


वक़्त के साथ इंसान बदल जाते हैं,
मज़हब-ओ-नाम क्या, ईमान भी बदल जाते हैं

कोई कैसे कहे बेवफ़ा हुस्न-ओ-नाज़ को
रुख़ हवा का देखकर, हम और आप बदल जाते हैं

ज़िन्दगी का सफ़र, सही-गलत फैसलों की मंजिल
राहें रोज़ बदलती रहीं, कभी हमकदम बदल जाते हैं

बीनाई कुछ और नहीं दरमयां दूरी का फलसफा
दरया-ए-रेत,वोही निगारिश, करीब से मंज़र बदल जाते हैं


इंसानी फितरत किया है उसने चलते-बदलते रहना
माज़ी का मुदावा करते-करते, मुस्तकबिल बदल जाते हैं

ईमान मर्ज़ी से मंसूब कर दें गर बुत को तो इबादत
ज़बां-ए-हम्द इलाकों बदलती रही, पैगम्बर भी यूँहीं बदल जाते हैं


बीनाई- देखने की क्षमता; निगारिश- खूबसूरत; माज़ी=भूतकाल; मुदावा=इलाज़; मुस्तकबिल= भविष्यकाल
मंसूब=समर्पित;  ज़बां-ए-हम्द=प्रार्थना की भाषा

Image Courtsey = Google

No comments:

Post a Comment