वक़्त के साथ इंसान बदल जाते हैं,
मज़हब-ओ-नाम क्या, ईमान भी बदल जाते हैं
कोई कैसे कहे बेवफ़ा हुस्न-ओ-नाज़ को
रुख़ हवा का देखकर, हम और आप बदल जाते हैं
ज़िन्दगी का सफ़र, सही-गलत फैसलों की मंजिल
राहें रोज़ बदलती रहीं, कभी हमकदम बदल जाते हैं
बीनाई कुछ और नहीं दरमयां दूरी का फलसफा
दरया-ए-रेत,वोही निगारिश, करीब से मंज़र बदल जाते हैं
इंसानी फितरत किया है उसने चलते-बदलते रहना
माज़ी का मुदावा करते-करते, मुस्तकबिल बदल जाते हैं
ईमान मर्ज़ी से मंसूब कर दें गर बुत को तो इबादत
ज़बां-ए-हम्द इलाकों बदलती रही, पैगम्बर भी यूँहीं बदल जाते हैं
बीनाई- देखने की क्षमता; निगारिश- खूबसूरत; माज़ी=भूतकाल; मुदावा=इलाज़; मुस्तकबिल= भविष्यकाल
मंसूब=समर्पित; ज़बां-ए-हम्द=प्रार्थना की भाषा
Image Courtsey = Google

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