Saturday, 28 April 2012

मैं भी..........

मैं भी
संगदिल खलाओं के रास्ते चलकर आया हूँ
गिनती कदमों और उनमें
काटों की अब तक नहीं कर पाया हूँ
रात सिरहाने
चंद अजनबी ख्वाब मिले हैं
सुबह कहती तू चलता जा
मैं तो तेरे सरमाया हूँ..

मैं भी
खशबुओं का बोझ साँसों उठा लाया हूँ
तमाम रास्ते इत्रबाजों से
लड़ता-भिड़ता, भागता हुआ आया हूँ
सुस्ताने बैठो
कितनी और रुंदी कलियाँ मिले हैं
आसुओं से प्यास बुझाता जा
मैं तो वैसे भी ज़ाया हूँ..

मैं भी
अपनी लाश दो ही कन्धों पाया हूँ
जब कभी जीने की रौशनी
लरजती खौफनाक माज़ी, घबराया हूँ
कब्र ढूंढ रहा हूँ
हमसफ़र सारे और ही कब्रिस्तान छुपे हैं
मौतें सारी लफ़्ज़ों में छुपाता जा
मैं भी तो सुनने आया हूँ..

मैं भी
तन्हाई-ओ-तल्खियत का हमसाया हूँ
रूमानी, इंसानी होने की कोशिश
नामुमकिन लफ्ज़ रास्ते में भूल आया हूँ
शुरुआत कर चुका हूँ
बेहतर दिलासे, बस साथ देता जा
मैं भी हसीं-खाब नेमतें लाया हूँ................


2 comments: