वोही ज़ज्बा जिसकी खुशबू में सारी कायनात महके है
तेरे ज़ेहन में पल भर को ही टिके, इत्र नहीं इश्क है कपूर
आवारगी-ओ-शायरी सिफ़र करें अच्छा होने का गरूर...
आप मांगें न मांगें वाइज़ सलाह मुफ्त करेगा
फ़ालतू वक़्त ज़ाया करें आप? न करें, मैं लिखूंगा ज़रूर.
आप हैं शायद लफ्ज़-ए-ज़न्नत-ए-ख़मीरी कोई हूर
मुआफी गर एहतराम ना हो पाया,होने का मुझसे
पेश-ए-खिदमत है, इक बददिमाग शायर हूजूर...
ना मासूमों के दर्द को देखो
ना ही तुम समझदार बनो
गर सुकूं से जीना है
दो-चार किताबें पढो, दुनियादार बनो
मजलूमों के दर्द से पिघलोगे
तुम पक्का बाकियों से पिछड़ोगे
अब भी तुमसे कहता हूँ
सिर्फ अपने मतलब के तावेदार बनो
बेकार है यूँ ज़ज्बाती होना
आंसूं दिखे नहीं कुछ ऐसे रोना
मुलम्मा जीने का आँखें करो,
वहशियत ख्वाबों में लिए ख़ुशगवार बनो
तज़ुर्बा मीर शख्सियतों का होना
रियाकार तुम झूठी कलम का होना
चाँद तारों की दुहाई नहीं देता
औरोंसे पहले तुम खुद के मददगार बनो
दम रखना तारीफों की लज्ज़त छुपाने
कोई तुमको कहे 'काफिर',
पहले उसको ही 'बुत' कहना
मौकापरस्ती सीखो और सियासतदार बनो
वो सिर्फ खुदा है, ईमान-ए-पाक़ है
उसने ज़वाब-ए-इश्क जाफा मांगी थी
ख्वाबों के जाम तोड़ो हिम्मत से
मुफत की रोटी तोड़ो इंसानियत के सरदार बनो
Image Courtesy - EMPIRE, acrylic on canvas

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