Monday, 9 April 2012

हंसीं खेल!!


बहारों का मौसम है
मिल जाती हैं आजकल
रूह-ए-पाक
बेवक्त तन्हाईयों के ज़ीने पर
लुकते-छिपते 
वो जो खूबसूरत भी हैं
और खुशनसीब भी...

घबराओ नहीं! 
जल्दी से छुप जाओ 
वजन थाम लेंगी 
इन खुद्दार ईंटों पर 
जीतने की बदगुमानी का रंग नहीं 

हूर-ए-ज़न्नत की आमद-बरामद 
सिर्फ रंग-ए-लहू गहराती है
हार की इल्म-ए-हकीकत
कमनसीबी का शौक इतना बुरा भी नहीं
के मंजिलों और हुस्न्बाज़ ज़माने की छतों तक
बिछते-छिपते रहने की दिल्लगी को 
आदत का नाम दे दिया जाये 

ये दबिश-ओ-दलीलें  
खुदपरस्ती की जेब से गिरे
किस्मत के खोटे सिक्के हैं
संभाल कर खेलना जब तक जी करे 
खुशियाँ खरीदने की नादाँ कोशिश
सिर्फ मेरे-तुम्हारे नहीं,
मजाज़ियों के भी 
हसीं खेल का मिजाज़ बिगाड़ देगी....

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