रिश्ता, ज़ज्बातों की दावत है
ज़रूरतों में पकता है
इसरार-ए-गुनाह परवान चढ़ जाए
ज़माने की थाली में सजता है
आँखें, खुलूसों की सजावट हैं
नीयत से बहती हैं
जो चाहो समंदर भी दिख जाए
हर ज़र्रा चमकता शीशे-सा दीखता है
आवाज़, लफ़्ज़ों की लिखावट है
होठों पर जिंदा है
मुसन्निफ़ कोई तो कान लगाए
सूफी, ग़ज़लें गाता हुआ थकता है
अदाएं, हुस्न-ओ-नाज़ की मिलावट है
लम्हे-नखरे शर्मिन्दा हैं
खूबसूरती कहाँ तक करार पाए
तारीफें करते-२, शायर नहीं रुकता है
मुहब्बत, फ़कत एक कहावत है
बुज़ुर्ग-अफसानों से राब्ता है
वफ़ा-ओ-ज़फ़ा का फर्क कर पाए
ख्वाब को हकीक़त से क्या वास्ता है
ऊब, ज़बरन जीने की कसावट है
दिलचस्पी से हांफता है
ख्वाब-ए-तसव्वुर ज़रा घूम कर आए
आदतन आवारा दिल कमरे में कहाँ टिकता है.....
ज़रूरतों में पकता है
इसरार-ए-गुनाह परवान चढ़ जाए
ज़माने की थाली में सजता है
आँखें, खुलूसों की सजावट हैं
नीयत से बहती हैं
जो चाहो समंदर भी दिख जाए
हर ज़र्रा चमकता शीशे-सा दीखता है
आवाज़, लफ़्ज़ों की लिखावट है
होठों पर जिंदा है
मुसन्निफ़ कोई तो कान लगाए
सूफी, ग़ज़लें गाता हुआ थकता है
अदाएं, हुस्न-ओ-नाज़ की मिलावट है
लम्हे-नखरे शर्मिन्दा हैं
खूबसूरती कहाँ तक करार पाए
तारीफें करते-२, शायर नहीं रुकता है
मुहब्बत, फ़कत एक कहावत है
बुज़ुर्ग-अफसानों से राब्ता है
वफ़ा-ओ-ज़फ़ा का फर्क कर पाए
ख्वाब को हकीक़त से क्या वास्ता है
ऊब, ज़बरन जीने की कसावट है
दिलचस्पी से हांफता है
ख्वाब-ए-तसव्वुर ज़रा घूम कर आए
आदतन आवारा दिल कमरे में कहाँ टिकता है.....
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