Tuesday, 24 April 2012

"पहचान"


यूँ तो मेरे कई चेहरे कई नाम हैं,
गौरतलब होगा कि तुम्हें किससे काम है.
हमने देखें हैं बाज़ार, रौनकें भी देखीं हैं,
अब हमसे ना कहो यहाँ ज़ज्बों के क्या दाम है
कितने हैं अल्लाह के बन्दे यहाँ
कितनो की ज़ेहन-ओ-जुबां में फर्क नहीं
अजां-ए-ईमान उठाने बचे कुछ सच्चे मुसलमान हैं.
समझ नहीं आती गर अपनी जरुरत
इस्तेमाल करने की भी हमसे नहीं हिम्मत
मोम सी हुई ज़िन्दगी, दश्त-ए-तन्हाई ईनाम है.
सबर करो, उम्मीद-ए-सहर ज़रूर आएगी
ज़ब्त करो वो ज़न्नत ज़मीं पर लाएगी
हलक घोंट दो गले मासूमों के, उसी खुदा का पैगाम है
तारीखें बदलेंगी सारे इंतजामात चलते रहेंगे
ज़बां-ओ-मज़हब के नाम तमाम जलते रहेंगे
जीतेगा तो हमेशा आलिम ही, अरबी में लिखी कुरान है.
हम हो जाएंगे सूफी, आवारा ग़ज़लें गाएँगे
किनारे बैठेंगे रहगुज़रों को रास्ता दिखायेंगे
बिना पढ़े इक आयत छपी ज़हन में, साफगोई हराम है.
तुम हमकौम दोस्त मेरे इक ज़रा करीब आकर देखो
और तुम भी,इक ज़रा हाथ लगाकर देखो कभी
ज़हन का चश्म ही मैला है या सच  में इंसानियत इलज़ाम है......


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