झूठे कसीदे पढना कैसे वाजिब
उसकी चाल सिर्फ फुर्तीली होती है
मटकती है वो गर
सिर्फ 'दिन' की लज्ज़त बढाने को
सरफिरा बीतेगा नहीं
हमनशीं शाम कब आएगी..
रास्ते और मंजिल टिके रहते हैं
दो-चार-दस-बीसियों साल, लगातार
किनारे फूल लगाने की जद्दोज़हद क्यूँ
पानी देने की ज़िम्मेदारी पैदाइश की नहीं है
अकलियत की खाद या ज़हर
मिला जड़ों में दरख्तों की
और बरपा पत्तियों पर क़हर
तोड़ने वाले, तोड़ कर मसलने वाले
चुराते रहे हैं बेबाक कलियों से नज़र
टालना बारहा उनका सवालों को
वाजिब नहीं इस उमर में तन्हा सफ़र
काश के बागबां ने उंश रक्खा होता
ज़मीं का बदन रौंदना
भूख मिटाने की जिद्दत में
फिरंगी तितलियों को टोका होता
वो आठवां रंग दिखा गईं इन्हीं कलियों को
फिज़ा ने सातों पहले ही बाँट दिए थे आसमां को
डर तीरगी से नहीं सफेदी से रहा भँवरे को
रंगों को तो फिर से कोई भी भर देगा
दाग़ सफेदी के पर से मिटाने आसान कहाँ
गटठरें बांधकर नन्हीं पीठों पर
भेज दिया नामचीन 'धोबीघाटों' पर
पीट-पीट कर चमकने के लिए
मुस्तकिल जोरदार ठोकरें
बदन से उतरकर जिद्दी दाग़
ख्वाब-ए-दोज़ख रात
कमउम्र जुगनुओं को सताते हैं
रवां होते हैं शिकार होते हैं
कुछ-एक गिरफ्तार-ए-सरूर होते हैं
मौत आती नहीं है उनको
शाम खुशामदगी चाँद की नहीं दिखती
शब्-ए-फुरकत की आमद
गुजरे हुए दिन को शर्मसार करते है................
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