कोई सूरत, कोई सीरत,
कोई ज़िस्म, कोई ज़ीनत
कहीं खमीरी से मुंह मोड़ती है?- मुहब्बत
हर ज़र्रा इक-दूसरी मायूस शक्लें, कोई बेलौस निदा तो मिले
काफिरी छोड़ मुसलमाँ हो जाएँ
बजाये खानाबदोशी,
उम्मीद-ए-सहर की गज़लें गायें
ज़बां-ओ-ज़ेहन में फर्क न हो जिसके,कोई दीगर खुदा तो मिले
नक्कारों की दुनिया में बेकारे शहजादे
यूँही मिसरों से बांटते रहे
मदहोशी-आवारगी का मुदावा आते-जाते
अशआरों ठहाके लगानेवाली, कोई हसीं लफ्ज़-ए-इदा तो मिले
आप नज़र करें, आपकी ख़िदमत है
यूँ तो वफ़ा-ज़फ़ा सब तिलस्मी खिलअत है
कुछ देर पहनकर उतार देती है रूह
जां-ए-रूह, बेवफा ही सही महबूब कोई हमशौक-ए-इब्तिदा तो मिले
ज़ीनत= Beauty ; खमीरी= materialism ; निदा= call ; लफ्ज़-ए-इदा= words of happiness ; खिलअत = clothes ; हमशौक-ए-इब्तिदा= same hobby of inventing /exploring
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