Monday, 9 April 2012

//निराशा//


मचल जाए तुम्हारी पलकों पर नींद 
ज़बड़े मेरे उबासी में ही खुलते हैं

छोटी मुलाकातों की कुछ हसीं निशानियों के शहर 
ढूंढना चाहे या न चाहे रास्ता भटका हुआ मुसाफिर

ज़िन्दगी बेतरतीब जीती गयी खुदको 
सलवट पड़ी हो चादर पर तो क्या वो बिस्तर नहीं

रात ने आंधी को टोका नहीं बस्तियां उजाड़ने से पहले
सुना है घर जिसका बच गया था वो तो पहले से ही फकीर है 


कुछ चेहरे सूरज-की सी रौशनी लिए होते हैं
अगर अँधेरे कमरे में इक छेद कर दो फिर तो दिख जाएँगे 
बाहर उजाले में सिर्फ इन्द्रधनुष ही आकर्षित करते हैं

अपेक्षाएं, लड़कपने की पतंग
ज़ब्त की खेंच, अपनी ओर हल्का झटका
निराशाओं की उड़ान और ऊँची उडती चली...........






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