Monday, 9 April 2012

मैं ग़ालिब तो नहीं...

मैं ग़ालिब तो नहीं...
मैं नहीं चाहता वाइज़ 
मुझे मरने के बाद जाने
तवज्जो न मिले मुझे बर्दाश्त नहीं
लिहाज़ा गरीबी लफ़्ज़ों की 
मेरे ज़ेहन पर गफ़लत रही

शायरी का इल्म नहीं 
सुबह रोज़ ही आ जाती है
शाम की बेशर्मी का भी ज़वाब नहीं
ये खुदी अक्सर खुदाई पर तोहमत रही


अंजाम की फिकर भी करेंगे
अभी दो-चार कदम चल दें
जाने कभी ख़तम हो सफ़र
अभी शुरुआत तो कर दें.

अंदाज़-ए-बयाँ अपना-अपना
पलकों पर हर ख्वाब का अलहदा रहना
पेपर की सारी cuttings , कबाड़ी को बेच दो
आज मिला है, फिर से कोई अपना


पूरी हो जाये गर शब्-ए-इंतज़ार कभी 
मैं यहीं पड़ा मिलूँगा, लाईनों की कब्र में
कभी फ़ुरसत में बदलो कीमती इल्म-ए-ज़हन के कपड़े
नींद-नरम तकिये की ओट लेकर मुझे ख्वाबों में ताकना


अपनी दुनिया तो खुद ही बनानी पड़ती है
सच्ची-झूठी, 
बाँट - बटखरे तो छांटने ही पड़ते हैं  
हालांकि तराजू तौलते हमेशा ही हाथ डगमगाते हैं

रोज़ के इनकार झेलकर
शब्-ए-ग़म-ए-फुरकत बाज़ भी नहीं आती है
आँखों का क्या है
ख्वाब भी यूँही बिना दस्तक चले आते हैं

वापसी गर मुमकिन होती बीते लम्हों की
ठहाके लगाती आब-ए-ग़म भी ज़मकर
इक बार जब रास्ता चल पड़े
रुक कर जहाँ भी देखो चौराहे मुस्कुराते हैं....



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